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सर्प आदि रेंगने वाली योनियों में स्थित पितर को श्राद्ध का अंश 'वायु' बनकर तृप्ति देता है। मंत्र शक्ति से अन्न उनकी योनि के योग्य रूप में रूपांतरित हो जाता है। मत्स्य/स्कंद पुराण का दर्शन।
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