योगसूत्र 2.30 — पांच यम (महाव्रत, सार्वभौमिक): अहिंसा (सर्व प्राणी दया), सत्य (मन-वचन-कर्म एकरूपता), अस्तेय (चोरी/लालसा न), ब्रह्मचर्य (ऊर्जा संयम/ईश्वर-चिंतन), अपरिग्रह (अत्यधिक संग्रह न)। अहिंसा सबसे पहले = सर्वोच्च। जाति/देश/काल से परे — सभी मनुष्यों के लिए।
- 1अर्थ — किसी भी प्राणी को मन, वचन, कर्म से हिंसा न करना। शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक — सभी प्रकार की हिंसा वर्जित।
- 2गहन अर्थ — केवल 'न मारना' नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति दया, करुणा और सम्मान।
- 3पतंजलि (2.35) — अहिंसा प्रतिष्ठित व्यक्ति की उपस्थिति में सभी प्राणियों की वैरभावना समाप्त हो जाती है।
- 4गांधी — अहिंसा को राजनीतिक शक्ति बनाया।
- 5अर्थ — सत्य बोलना, सत्य आचरण। मन-वचन-कर्म में एकरूपता।
- 6गहन अर्थ — केवल झूठ न बोलना नहीं, बल्कि यथार्थ को जैसा है वैसा स्वीकार करना। स्वयं से भी सत्य।
- 7सावधानी — यदि सत्य बोलने से किसी को हिंसा हो, तो अहिंसा प्राथमिक (यही कारण है कि अहिंसा पहले आती है)।
- 8पतंजलि (2.36) — सत्य प्रतिष्ठित व्यक्ति की वाणी फलित होती है — जो कहे वह सत्य होता है।
- 9अर्थ — चोरी न करना — भौतिक वस्तु, बौद्धिक संपदा, समय, श्रेय — कुछ भी।
- 10गहन अर्थ — दूसरों की वस्तुओं की इच्छा/लालसा भी अस्तेय भंग है।
- 11पतंजलि (2.37) — अस्तेय प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास सब रत्न स्वयं आते हैं।
- 12अर्थ — संकुचित: यौन संयम, शारीरिक इंद्रिय नियंत्रण। व्यापक: ब्रह्म (ईश्वर/सत्य) में चरण (विचरण) = ब्रह्मचर्य — ईश्वर-चिंतन में स्थिति।
- 13गहन अर्थ — यौन ऊर्जा का संरक्षण और उसका आध्यात्मिक/रचनात्मक उपयोग। गृहस्थ में संयमित दांपत्य।
- 14पतंजलि (2.38) — ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित व्यक्ति को वीर्य (ऊर्जा/शक्ति) प्राप्त होती है।
- 15अर्थ — आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। भौतिक वस्तुओं का अत्यधिक संचय वर्जित।
- 16गहन अर्थ — केवल भौतिक नहीं, मानसिक संग्रह (विचारों, भावनाओं, पहचान) का भी त्याग। उपभोग करो, जमा मत करो।
- 17पतंजलि (2.39) — अपरिग्रह स्थिर होने पर जन्मांतर ज्ञान (पूर्वजन्मों का ज्ञान) प्राप्त होता है।