शिव ने गंगा जटाओं में क्यों धारण किया कथा
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सगर पुत्रों (60,000) की मुक्ति हेतु भगीरथ ने तपस्या से गंगा को स्वर्ग से बुलाया। गंगा का प्रचंड वेग पृथ्वी नष्ट कर देता, अतः शिव ने जटाओं में धारण कर वेग नियंत्रित किया। आध्यात्मिक: गंगा=ज्ञान, शिव=गुरु — बिना गुरु ज्ञान नियंत्रित नहीं।
- 1सगर के 60,000 पुत्र — राजा सगर के यज्ञ का घोड़ा खोजते हुए उनके 60,000 पुत्रों ने कपिल मुनि के आश्रम में प्रवेश किया और मुनि को चोर समझकर अपमान किया। कपिल मुनि के क्रोध (तेज) से वे भस्म हो गए।
- 2मुक्ति का उपाय — उनकी आत्माओं की मुक्ति तभी संभव थी जब गंगा जल उनकी अस्थियों/भस्म पर प्रवाहित हो।
- 3भगीरथ की तपस्या — सगर के वंशज भगीरथ ने कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। ब्रह्मा ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने का आदेश दिया।
- 4समस्या — गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि सीधे पृथ्वी पर गिरने से प्रलय हो जाता।
- 5शिव की भूमिका — भगीरथ ने शिव जी से प्रार्थना की। शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और उसके प्रचंड वेग को नियंत्रित कर धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
- 6पृथ्वी पर गंगा — शिव की जटाओं से निकलकर गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे पाताल तक गई और सगर पुत्रों को मुक्ति मिली।
- 7वेग नियंत्रण — गंगा का स्वर्गीय प्रवाह इतना शक्तिशाली था कि पृथ्वी इसे सहन नहीं कर सकती थी।
- 8गंगा का अहंकार — कुछ पाठों में गंगा ने अहंकार किया कि मैं शिव को भी बहा दूंगी। शिव ने जटाओं में बांधकर उसका अहंकार तोड़ा।
- 9शिव = मध्यस्थ — शिव ने स्वर्ग (दिव्य) और पृथ्वी (भौतिक) के बीच सेतु का कार्य किया।
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