पूजा = बाह्य उपासना (शिवलिंग, सामग्री, षोडशोपचार, सगुण)। ध्यान = आंतरिक उपासना (मानसिक, निर्गुण, सामग्री रहित)। पूजा → चित्त शुद्धि → ध्यान में सफलता। दोनों अंततः एक — 'शिवोऽहम्' चरम अवस्था जहां पूजक-पूज्य भेद मिटे।
1बाह्य क्रिया प्रधान — शिवलिंग, मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर।
2षोडशोपचार — जल, दूध, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सेवा।
3मंत्र जप — वाचिक या उपांशु जप।
4सामग्री आवश्यक — बिल्वपत्र, रुद्राक्ष माला, पंचामृत आदि।