संध्या काल में मंत्र जप करने का क्या महत्व है?
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संध्या = दो ऊर्जाओं का मिलन — मंत्र शक्ति अधिक। 'संध्याहीनोऽशुचिः' — संध्या बिना अशुद्ध। प्रातः (ब्रह्म मुहूर्त) = सर्वोत्तम। मध्याह्न = मध्यम। सायं = द्वितीय। कम से कम प्रातः संध्या = अनिवार्य। गायत्री = सूर्य मंत्र = संध्या हेतु।
- 1ऊर्जा संक्रमण: संध्या = दो ऊर्जाओं का मिलन (दिन/रात, प्रकाश/अंधकार)। इस समय वातावरण में विशेष ऊर्जा — मंत्र शक्ति अधिक प्रभावी।
- 2वैदिक विधान: संध्या वंदन = हिंदू धर्म का मूल कर्तव्य। 'संध्याहीनोऽशुचिः नित्यम्' — संध्या न करने वाला सदा अशुद्ध।
- 3मन सबसे शांत: प्रातः संध्या (ब्रह्म मुहूर्त) = मन सबसे शांत, सात्विक। सायं संध्या = दिन के कर्मों के बाद शांति।
- 4गायत्री मंत्र: गायत्री = सवितृ (सूर्य) मंत्र — सूर्योदय/सूर्यास्त = सर्वोत्तम।
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