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स्पर्श दीक्षा और मंत्र दीक्षा में क्या अंतर है?

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मंत्र दीक्षा: गुरु कान में मंत्र देता है — शिष्य जप से शक्ति जागृत, क्रमिक प्रभाव, सामान्य। स्पर्श दीक्षा (शक्तिपात): गुरु स्पर्श से शक्ति प्रवाहित — तत्काल अनुभूति, अत्यन्त दुर्लभ, केवल सिद्ध गुरु से। अन्य: दृष्टि दीक्षा, मानसी दीक्षा, शाम्भवी। दीक्षा = साधना का अनिवार्य प्रथम चरण।

  1. 1शिष्य गुरु के दाहिने कान में (या गुरु शिष्य के दाहिने कान में) मंत्र कहता है
  2. 2गुरु मंत्र का अर्थ, जप विधि, नियम बताता है
  3. 3माला, आसन, दीक्षा यंत्र प्रदान
  4. 4शिष्य को नित्य जप का आदेश
  5. 5शिष्य को स्वयं साधना करनी होती है
  6. 6मंत्र शक्ति धीरे-धीरे जप से जागृत होती है
  7. 7शिष्य के अपने पुरुषार्थ पर अधिक निर्भर
  8. 8सबसे सामान्य — अधिकांश साधकों को यही मिलती है
  9. 9गुरु शिष्य के मस्तक, आज्ञा चक्र, हृदय, या मूलाधार पर हाथ रखता है
  10. 10गुरु अपनी तपस्या की शक्ति शिष्य में प्रवाहित करता है
  11. 11शिष्य को तत्काल अनुभूति हो सकती है — ऊष्मा, प्रकाश, कम्पन, आनन्द
  12. 12कुंडलिनी जागरण भी स्पर्श दीक्षा से सम्भव
  13. 13शक्ति गुरु से सीधे प्रवाहित — शिष्य के पुरुषार्थ पर कम निर्भर
  14. 14तत्काल या शीघ्र प्रभाव
  15. 15अत्यन्त दुर्लभ — केवल सिद्ध गुरु ही दे सकते हैं
  16. 16गुरु को अपनी शक्ति व्यय करनी पड़ती है
  17. 17दृष्टि दीक्षा (नैयनी) — गुरु की दृष्टि मात्र से
  18. 18मानसी दीक्षा — गुरु मन से शक्ति भेजता है (गुरु-शिष्य दूर हों तब भी)
  19. 19शाम्भवी दीक्षा — सर्वोच्च — शिव-कृपा से
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