विस्तृत उत्तर
तंत्र शास्त्र में दीक्षा के अनेक प्रकार बताए गए हैं। स्पर्श दीक्षा और मंत्र दीक्षा — ये दो प्रमुख प्रकार हैं जिनमें मूलभूत अंतर है।
मंत्र दीक्षा (मांत्री दीक्षा)
1परिभाषा
गुरु शिष्य के कान में (कर्ण में) मंत्र फूँककर दीक्षा देता है। यह सबसे प्रचलित और सामान्य दीक्षा विधि है।
2प्रक्रिया
- ▸शिष्य गुरु के दाहिने कान में (या गुरु शिष्य के दाहिने कान में) मंत्र कहता है
- ▸गुरु मंत्र का अर्थ, जप विधि, नियम बताता है
- ▸माला, आसन, दीक्षा यंत्र प्रदान
- ▸शिष्य को नित्य जप का आदेश
3विशेषता
- ▸शिष्य को स्वयं साधना करनी होती है
- ▸मंत्र शक्ति धीरे-धीरे जप से जागृत होती है
- ▸शिष्य के अपने पुरुषार्थ पर अधिक निर्भर
- ▸सबसे सामान्य — अधिकांश साधकों को यही मिलती है
स्पर्श दीक्षा (शक्तिपात दीक्षा)
4परिभाषा
गुरु अपने स्पर्श मात्र से शिष्य में शक्ति का संचार करता है। इसे 'शक्तिपात' भी कहते हैं।
5प्रक्रिया
- ▸गुरु शिष्य के मस्तक, आज्ञा चक्र, हृदय, या मूलाधार पर हाथ रखता है
- ▸गुरु अपनी तपस्या की शक्ति शिष्य में प्रवाहित करता है
- ▸शिष्य को तत्काल अनुभूति हो सकती है — ऊष्मा, प्रकाश, कम्पन, आनन्द
- ▸कुंडलिनी जागरण भी स्पर्श दीक्षा से सम्भव
6विशेषता
- ▸शक्ति गुरु से सीधे प्रवाहित — शिष्य के पुरुषार्थ पर कम निर्भर
- ▸तत्काल या शीघ्र प्रभाव
- ▸अत्यन्त दुर्लभ — केवल सिद्ध गुरु ही दे सकते हैं
- ▸गुरु को अपनी शक्ति व्यय करनी पड़ती है
तुलनात्मक अंतर
| विषय | मंत्र दीक्षा | स्पर्श दीक्षा |
|---|---|---|
| माध्यम | ध्वनि (मंत्र) | स्पर्श (शक्तिपात) |
| प्रक्रिया | गुरु मंत्र देता है | गुरु शक्ति प्रवाहित करता है |
| प्रभाव काल | क्रमिक (जप से) | तत्काल/शीघ्र |
| शिष्य का प्रयास | अधिक — स्वयं जप | कम — गुरु-कृपा प्रधान |
| गुरु पर प्रभाव | न्यून | गुरु की शक्ति व्यय |
| उपलब्धता | सामान्य | अत्यन्त दुर्लभ |
| योग्यता | सभी अधिकारी | केवल योग्य शिष्य |
अन्य दीक्षा प्रकार (संदर्भ)
- ▸दृष्टि दीक्षा (नैयनी) — गुरु की दृष्टि मात्र से
- ▸मानसी दीक्षा — गुरु मन से शक्ति भेजता है (गुरु-शिष्य दूर हों तब भी)
- ▸शाम्भवी दीक्षा — सर्वोच्च — शिव-कृपा से
कुलार्णव तंत्र
दीक्षा बिना नहीं सिद्धि, सिद्धि बिना नहीं मुक्ति।' — दीक्षा (किसी भी प्रकार की) तंत्र साधना का अनिवार्य प्रथम चरण है।
