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तीन ऋण कौन से हैं?

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तीन ऋण = (1) देव ऋण (2) ऋषि ऋण (3) पितृ ऋण। महर्षियों ने तीनों से उऋण होने का कठोर विधान दिया। पितृ ऋण से मुक्ति का एकमात्र शास्त्र-सम्मत मार्ग = श्राद्ध कर्म।

  1. 1देवताओं के प्रति मनुष्य का ऋण।
  2. 2ऋषियों और महर्षियों के प्रति ऋण, जिन्होंने ज्ञान-परंपरा प्रदान की।
  3. 3अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति ऋण।
  4. 4पितृ ऋण से मुक्ति का एकमात्र शास्त्र-सम्मत मार्ग = श्राद्ध कर्म।
  5. 5महर्षियों ने इन तीनों ऋणों से उऋण होने का कठोर विधान निर्धारित किया है।
  6. 6इन तीनों में से किसी एक को भी अनदेखा करने पर मनुष्य का जीवन अपूर्ण माना जाता है।
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