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विस्तृत उत्तर
त्रिविध ऋण = महर्षियों और धर्मशास्त्रकारों द्वारा निर्धारित मनुष्य के तीन अनिवार्य ऋण, जिनसे उऋण होना प्रत्येक मनुष्य का कठोर शास्त्रीय कर्तव्य है।
### तीन ऋण:
1देव ऋण
- ▸देवताओं के प्रति मनुष्य का ऋण।
2ऋषि ऋण
- ▸ऋषियों और महर्षियों के प्रति ऋण, जिन्होंने ज्ञान-परंपरा प्रदान की।
3पितृ ऋण
- ▸अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति ऋण।
- ▸पितृ ऋण से मुक्ति का एकमात्र शास्त्र-सम्मत मार्ग = श्राद्ध कर्म।
### शास्त्रीय विधान:
- ▸महर्षियों ने इन तीनों ऋणों से उऋण होने का कठोर विधान निर्धारित किया है।
- ▸इन तीनों में से किसी एक को भी अनदेखा करने पर मनुष्य का जीवन अपूर्ण माना जाता है।
### पितृ ऋण की विशिष्टता:
इन तीनों में पितृ ऋण से मुक्ति का एकमात्र मार्ग 'श्राद्ध' है — यही कारण है कि श्राद्ध कर्म को सनातन धर्म में सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
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