देवता-अनुसार तंत्र-रंग: काली (लाल/काला), भैरव (काला/भगवा), त्रिपुरसुंदरी (लाल), तारा (नीला), बगलामुखी (पीला — अनिवार्य), धूमावती (सफेद/ग्रे), कमला (पीला/सुनहरा), मातंगी (हरा)। नियम: साधना-काल में एक ही रंग, ताजे धुले वस्त्र। रंग साधना का अंग — बदला नहीं जा सकता।
- 1देवता के अनुरूप वस्त्र-वर्ण साधक के लिए विहित है। वस्त्र-वर्ण साधना का अंग है और सिद्धि देने वाला है।
- 2लाल — सर्वोत्तम (शक्ति, रक्त, तेज का प्रतीक)
- 3काला — श्मशान-साधना और उग्र तांत्रिक साधना में
- 4कालीकुल: 'काल्यै रक्तवस्त्रं श्रेष्ठम्।'
- 5काला — कालभैरव का मूल वर्ण
- 6गेरुआ/भगवा — बटुकभैरव साधना में
- 7काले वस्त्र = रात्रि-साधना में रक्षा-कवच
- 8लाल — त्रिपुरसुंदरी का वर्ण
- 9गुलाबी — सौम्य रूप की साधना में
- 10शारदातिलक: श्रीविद्या में लाल वस्त्र, लाल आसन, लाल सब।
- 11नीला — तारा का मूल वर्ण
- 12श्वेत — शांत रूप की साधना में
- 13पीला — अनिवार्य। बगलामुखी साधना में पीले के अलावा कोई रंग स्वीकार्य नहीं।
- 14कुलार्णव: 'बगलायाः पीतवस्त्रं सर्वदा।'
- 15लाल — उग्र शक्ति का प्रतीक
- 16सफेद या धुएँ-रंग (ग्रे) — विधवा-स्वरूप की देवी
- 17पीला या सुनहरा — वैभव और समृद्धि का प्रतीक
- 18हरा — सरस्वती-अंश, प्रकृति का रंग
- 19लाल या सुनहरा — ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री
- 20साधना-काल में एक ही रंग के वस्त्र — भिन्न-रंग वर्जित
- 21ताजे धुले वस्त्र — प्रत्येक साधना में
- 22सिले हुए वस्त्र (stitched) — अनुमत। कुछ उच्च साधनाओं में अखण्ड (अनसिला) वस्त्र।