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भूमि पूजन प्रकरण

भूमि पूजन प्रकरण विधि - कर्मकांड भास्कर

मूल स्रोत: पृष्ठ 114–117

भूमि पूजन प्रकरण

॥ भूमि पूजन प्रकरण ॥ सूत्र संकेत- भूमि में बीज ही नहीं संस्कार भी उपजते हैं । मरघटों के वीभत्स-चीत्कार भरे डरावने और आश्रमों के शान्त, सुरभित, मनोरम वातावरण को हर कोई स्पष्ट अनुभव कर सकता है । इस अन्तर का कारण इन स्थानों में प्रसन्‍नता का प्रस्फुटन है, यह इस तथ्य का प्रतीक है कि भूमि में अच्छे-बुरे संस्कार ग्रहण करने, आत्मसात्‌ करने की विलक्षण शक्ति होती है । इसी कारण भारतीय संस्कृति में प्रत्येक कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भूमि पूजन आवश्यक माना गया है । गायत्री शक्तिपीठें प्रज्ञा आलोक को प्रेरणा केन्द्र बनने जा रही हैं । अतः इन देवालयों में प्रारम्भ से ही वह संस्कार पैदा किये जाने चाहिए । इसके लिए भूमि पूजन समारोह अनिवार्य बना दिये गये हैं । पौरोहित्य की परम्परा की दृष्टि से भी भूमि पूजन कृत्य अपने उत्तरदायी सभी परिजनों को अवश्य जानना चाहिए । भवन बनाने के पूर्व, नये स्थान पर बड़े यज्ञादि करने के पूर्व तथा गृह प्रवेश क्रम में भी इस प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है । क्रम व्यवस्था- भूमि पूजन जहाँ करना हो, उस स्थान पर सामर्थ्य के अनुसार सुरुचि एवं स्वच्छता का वातावरण बनाना चाहिए । कर्मकाण्ड के लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिए, जहाँ पर होने वाले पूजन-उपचार को उपस्थित

समुदाय भली प्रकार देख-सुन सके । भूमि पूजन का विशेष कर्मकाण्ड भर यहाँ दिया जा रहा है । उसके आगे-पीछे सामान्य कर्मकाण्डों की विवेकपूर्ण श्रृंखला जोड़ लेनी चाहिए । यदि समय हो और व्यवस्था ठीक प्रकार बनाई-संभाली जा सके, तो यह कार्य यज्ञ सहित सम्पन्न किया जा सकता है । पहले षट्कर्म से लेकर रक्षाविधान तक का कृत्य पूरा कर लिया जाए । उसके बाद भूमि पूजन का विशेष क्रम चलाया जाए । उसके पूर्ण होने पर अग्नि स्थापना से लेकर अन्त तक के शेष कर्मकाण्ड पूरे किये जाएँ । यदि समय और व्यवस्था की दृष्टि से यह अधिक कठिन लगे, तो षट्कर्म के बाद संकल्प, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन कराकर भूमि पूजन कराया जाए । उसके बाद गायत्री मन्त्र बोलते हुए पाँच घी के दीपक जलाए जाएँ । अन्त में क्षमा प्रार्थना, नमस्कार, शुभकामना, अभिसिंचन, विसर्जन एवं जयघोष कराकर कार्यक्रम समाप्त किया जा सकता है । क्रम इस प्रकार है- (१) षट्कर्म- उपयुक्त प्रतिनिधियों को पूजा स्थान पर बिठाकर पहले षट्कर्म अर्थात्‌ (१) पवित्रीकरण (२) आचमन (३) शिखावन्दन (४) प्राणायाम (५) न्यास (६) पृथ्वी पूजन कराये जाएँ । यदि बिठाकर षट्कर्म कराने की स्थिति न हो, तो खड़े-खड़े ही केवल पवित्रीकरण मन्त्र से सामूहिक सिंचन कराकर आगे बढ़ा जा सकता है । (२) संकल्प- प्रतिनिधियों के हाथ में अक्षत, पुष्प, जल आदि देकर भूमि पूजन का संकल्प बोला जाए । मन्त्र बोलने के बाद पुष्प-अक्षत उसी भूमि पर चढ़ा दिये जाएँ, जिसका पूजन किया जा रहा हो । ...नामाहं पृथिवीमातुः ऋणं अपाकर्तु तां प्रतिस्वकर्तव्यं स्मर्तु अस्याः निकृष्टसंस्कार-निस्सारणार्थ श्रेष्ठसंस्कार- स्थापनार्थञ्च देवपूजनपूर्वकं सपरिजना श्रद्धापूर्वकं भूमिपूजनं वयं करिष्यामहे । (३) सामान्य पूजा-उपचार- संकल्प के बाद व्यवस्थानुसार देव पूजन-स्वस्तिवाचन आदि कार्य कराए जाएँ । (४) भूमि अभिषिंचन- शुभ कार्य के लिए जिस भूमि का प्रयोग

किया जाना है, उसमें पवित्रता के संचार के लिए यह प्रक्रिया है । एक प्रतिनिधि पात्र में पवित्र जल लेकर कुशाओं, आम्र-पल्लवों या पुष्पों से भूमि के चारों ओर छींटे लगाएँ । नीचे लिखे पाँचों मन्त्रों के साथ देवशक्तियों से उस क्षेत्र सहित सभी परिजनों के लिए पवित्रता की याचना की जाए । ॐ पुनन्तु मा देवजनाः, पुनन्तु मनसा धियः । पुनन्तु विश्वा भूतानि, जातवेदः पुनीहि मा ॥ १९.३९ ॐ पुनाति ते परिसुतं , सोमं सूर्यस्य दुहिता । वारेण शश्वता तना ॥ १९.४ ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः, प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य, यत्कामः पुने तच्छकेयम्‌ ॥ १.१२४.४ ॐ पवित्रेण पुनीहि मा, देव दीद्यत्‌ । अग्ने कृत्वा क्रतूँरनु ॥ - १९.४० ॐ पवमानः सो अद्य न, पवित्रेण विचर्षणिः । यः पोता स पुनातु मा ॥ १९.४२ (५) प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजन- प्राणवान्‌-तेजस्वितायुक्त व्यक्तित्व ही अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील हो सकता है और उसे हस्तगत कर सकता है । स्थान विशेष को भी प्राण-सम्पन्न बनाने के उद्देश्य से भूमि- प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजन का क्रम बनाया गया है । दाहिने हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर पृथ्वी पर प्राण तत्त्व संचारणार्थ निम्न मन्त्र बोलकर छोड़े जाएँ । ॐ मही द्यौः पृथिवी च न ऽ , इमं यज्ञं मिमिक्षताम्‌ । पिपृतां नो भरीमभिः ॥ ८.३२ तत्पश्चात्‌ गन्धाक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादि से पृथ्वी पूजन करें । ॐ गन्धाक्षत, पुष्पाणि, धूपं, दीपं, नैवेद्यं समर्पयामि । ॐ श्री पृथिव्ये नमः । पूजन के पश्चात्‌ दोनों हाथ जोड़कर नीचे लिखे मन्त्र बोलकर धरती माता को नमस्कार करें--

ॐ शेषमूर्ध्निस्थितां रम्यां, नानासुखविधायिनीम्‌ । विश्वधात्रीं महाभागां, विश्वस्य जननीं पराम्‌ ॥ यज्ञभागं प्रतीक्षस्व, सुखार्थं प्रणमाम्यहम्‌ । तवोपरि करिष्यामि, मण्डपं सुमनोहरम्‌ ॥ क्षन्तव्यं च त्वया देवि, सानुकूला मखे भव । निर्विघ्नं मम कर्मेदं, यथा स्यात्त्वं तथा कुरु ॥ - गा० पु० प० (६) मांगलिक द्रव्य स्थापना- पूजन के उपरान्त भूमि में मांगलिक द्रव्य स्थापित किये जाते हैं । यह धरती माँ के प्रति अपनी सद्भावना की अभिव्यक्ति भी है और होने वाले कार्य का शुभारम्भ भी । हम धरती माँ के आँचल में मांगलिक पदार्थ रखकर अपनी सद्भावना का परिचय देते हैं । इस कर्म के दो भाग हैं- (१) खनित्र ( खोदने वाले उपकरणों) का पूजन एवं उत्खनन । (२) द्रव्य स्थापना । सत्कार्य के लिए जो माध्यम बनते हैं, वे सम्माननीय हैं, उन्हें भी सुसंस्कारित करना चाहिए । इन भावों के साथ खनित्र पूजन करें । प्रतिनिधि दाहिने हाथ में रोली, अक्षत, पुष्प एवं जल ले, मन्त्र बोलते हुए उन्हें खनित्र पर चढ़ाएँ, साथ ही निर्धारित स्थान पर उससे छोटा-सा गड्ढा खोद लें । ॐ शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता, नमस्ते अस्तु मा मा हिं सीः। निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय, प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥ २६.३ इसके बाद पाँच द्रव्य- हल्दी, दूर्वा, सुपारी, कलावा एवं अक्षत लिये जाते हैं । हल्दी शुभ, सौभाग्य एवं आरोग्यदात्री मानी जाती है । दुर्वा (दूब) विकास एवं अजरता की प्रतीक है, सुपारी स्थिर सुपरिणाम वाले फल का प्रतीक है । कलावा व्रत-संयम के बन्धन का प्रतीक एवं अक्षत श्री, समृद्धि और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है । भूमि में इन सभी विशेषताओं की स्थापना के भाव सहित मन्त्र के साथ इन द्रव्यों को भूमि में स्थापित करें । ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे, भूतस्य जातः पतिरेकऽआसीत्‌। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां, कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ २३.१ अंत में आवश्यक उद्बोधन, पूर्णाहुति, आरती आदि सम्पन्न करें ।