षोडशोपचार पूजन, रुद्राभिषेक, गृह-प्रवेश, सत्यनारायण कथा, संस्कार, यज्ञ एवं श्राद्ध की प्रामाणिक हिन्दी विधियाँ — मंत्र, संकल्प और चरण-दर-चरण निर्देश के साथ।

॥ विशिष्ट प्रकरण ॥ ॥ शक्तिपीठों की दैनिक पूजा ॥ गायत्री शक्तिपीठों में मातृशक्ति की प्रतिमाएँ स्थापित हैं । अस्तु, उनकी नियमित पूजा-अर्चा का क्रम चलता है । इसके लिए यह पद्धति दी जा रही है । युग निर्माण अभियान के अन्तर्गत

कलशस्थापन ॥ सूत्र संकेत- कलश की स्थापना और पूजा लगभग प्रत्येक कर्मकाण्ड में की जाती है । सामान्य रूप से कलश पहले से तैयार रखा रहता है और पूजन क्रम में उसका पूजन करा दिया जाता है । यदि कहीं इस प्रकरण का विस्तार करना आवश्य

॥ सर्वतोभद्र वेदिका पूजन ॥ प्रधान वेदी पर अर्थात् सर्वतोभद्र मण्डल पर निम्न मन्त्रों के साथ तैंतीस देवताओं का श्रद्धा-भक्तिपूर्वक आवाहन करना चाहिए प्रत्येक देवता के आवाहन के साथ निर्धारित वर्ग पर अक्षत, पुष्प, सुपाड़ी छ

॥ पुरुष सूक्त ॥ सूत्र संकेत- पुरुष सूक्त का प्रयोग विशेष पूजन के क्रम में किया जाता है । षोडशोपचार पूजन के एक-एक उपचार के साथ क्रमशः एक-एक मन्त्र बोला जाता है । जहाँ कहीं भी किसी देवशक्ति का पूजन विस्तार से करना हो, तो प

॥ त्रिदेव पूजन ॥ सूत्र संकेत- युग निर्माण अभियान के अन्तर्गत, जो बड़े आयोजन होते हैं, उनमें त्रिदेव पूजन की परिपाटी है । इसमें आद्यशक्ति वेदमाता गायत्री, भारतीय धर्म के जनक यज्ञदेव और युगावतार के प्रतीक ज्योति पुरुष, जन-

॥ पंचवेदी पूजन ॥ सूत्र संकेत- हमारा शरीर अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश तथा आनन्दमय कोश के द्वारा विनिर्मित है । स्वेदज, अण्डज, उद्भिज, जरायुज चार प्रकार के प्राणी और पाँचवें जड़ पदार्थ, यह पंचधा प्रकृ

॥ पंचभू-संस्कार ॥ सूत्र संकेत- यज्ञादि कर्मकाण्डों के अन्तर्गत भूमि को संस्कारित करने के लिए पंच भू-संस्कार करने की परिपाटी है । संक्षिप्त पूजन क्रम में षट्कर्मों के अन्तर्गत पृथ्वी पूजन करके उस भूमि में पवित्रता के संस्

॥ कुशकण्डिका ॥ सूत्र संकेत- कुश पवित्रता और प्रखरता के प्रतीक माने जाते हैं । कुशकण्डिका के अन्तर्गत निर्धारित क्षेत्र के चारों दिशाओं में कुश बिछाये जाते हैं । बड़े यज्ञों और विशिष्ट कर्मकाण्डों में यज्ञशाला, यज्ञकुण्ड

॥ मेखलापूजन ॥ सूत्र संकेत- यज्ञ कुण्ड के चारों ओर मेखलाएँ बनाई जाती हैं । कुण्डों में यह सीढ़ीनुमा होती हैं । वेदी पर यज्ञ करते समय तीन रेखाएँ विनिर्मित की जाती हैं । अन्दर वाली मेखला सफेद, बीच वाली लाल तथा बाहर वाली काल

॥ पंचामृतकरण ॥ संकेत- गो का महत्त्व ब्राह्मण और माँ के समान कहा गया है । उसके महत्व को समझने तथा उसके गुणों का लाभ उठाने के लिए धार्मिक कर्मकाण्डों के साथ पंचामृत पान का क्रम जोड़ा गया है । सामान्य क्रम में पंचामृत बनाकर

॥ दशविध स्नान ॥ सूत्र संकेत- दस स्नान का प्रयोग देव प्रतिमाओं की स्थापना के समय, श्रावणी उपाकर्म, वानप्रस्थ संस्कार तथा प्रायश्चित्त विधानों में किया जाता है, उनमें यह प्रकरण ले लेना चाहिए । क्रम व्यवस्था- यज्ञ या संस्का

॥ जलयात्राविधान ॥ सूत्र संकेत- जल यात्रा युग निर्माण योजना के यज्ञाभियान की एक बहुत प्रभावशाली और उपयोगी प्रक्रिया रही है । यदि जल यात्रा की व्यवस्था ठीक ढंग से की जाए तो उससे अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं । जैस

॥ स्फुट प्रकरण ॥ कर्मकाण्ड में रक्षासूत्र-बन्धन, तिलक, आशीर्वाद आदि ऐसे क्रम हैं, जो कर्मकाण्ड में बराबर आते रहते हैं । सामूहिक क्रम में यह कृत्य लम्बे समय तक भी चलते हैं । उस समय मन्त्रोच्चार और प्रेरणा-व्याख्या का मिला

॥ भूमि पूजन प्रकरण ॥ सूत्र संकेत- भूमि में बीज ही नहीं संस्कार भी उपजते हैं । मरघटों के वीभत्स-चीत्कार भरे डरावने और आश्रमों के शान्त, सुरभित, मनोरम वातावरण को हर कोई स्पष्ट अनुभव कर सकता है । इस अन्तर का कारण इन स्थानों

॥ गृह प्रवेश-वास्तु शान्ति प्रयोग ॥ नये-पुराने निर्मित मकान, दुकान आदि में निवास प्रारम्भ करने के पूर्व या रहने के समय गृह प्रवेश या वास्तु शान्ति का प्रयोग सम्पन्न करना प्रायः अनिवार्य सा माना जाता है । इस आवश्यकता की प

॥ प्राण-प्रतिष्ठा प्रकरण ॥ सूत्र संकेत- देवालयों में प्रतिमा का पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व उनमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है । उसके पीछे मात्र परम्परा नहीं, परिपूर्ण तत्त्वदर्शन सन्निहित है । इस परम्परा के साथ हमारी सांस

॥ संस्कार प्रकरण ॥ शास्त्रीय पृष्ठभूमि व्युत्पत्तिपरक अर्थ- सम् पूर्वक कृञ् धातु से घञ् प्रत्यय होकर संस्कार शब्द निष्पन्न होता है । जिसका अर्थ है- संस्करणं सम्यक्करणं वा संस्कारः अर्थात् परिष्कार करना अथवा भली प्रका

॥ पुंसवन संस्कार ॥ गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए गर्भिणी का यह संस्कार किया जाता है । कहना न होगा कि बालक को संस्कारवान् बनाने के लिए सर्वप्रथम जन्मदाता माता-पिता को सुसंस्कारी होना चाहिए । उन्हें बालकों के प्रजनन

॥ नामकरण संस्कार ॥ संस्कार प्रयोजन- नामकरण शिशु जन्म के बाद पहला संस्कार कहा जा सकता है । यों तो जन्म के तुरन्त बाद ही जातकर्म संस्कार का विधान है, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में वह व्यवहार में नहींं दीखता । अपनी पद्धति

॥ अन्नप्राशन संस्कार ॥ संस्कार प्रयोजन - बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है, तो वह शुभारम्भ यज्ञीय वातावरण युक्त धर्मानुष्ठान के रूप में होता है । इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्क

॥ मुण्डन (चूड़ाकर्म) संस्कार ॥ संस्कार प्रयोजन - इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार उतारे जाते है । लौकिक रीति यह प्रचलित है कि मुण्डन, बालक की आयु एक वर्ष की होने तक करा लें अथवा दो वर्ष पूरे होने पर तीसरे वर्ष

॥ विद्यारम्भ संस्कार ॥ संस्कार प्रयोजन प्रत्येक अभिभावक का यह परम पुनीत धर्म कर्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ आई हुई जिम्मेदारियों मे से भोजन, वस्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होने पर उसकी शिक्षा-दीक्षा
॥ यज्ञोपवीत संस्कार ॥ संस्कार प्रयोजन- शिखा और सूत्र भारतीय संस्कृति के दो सर्वमान्य प्रतीक हैं । शिखा भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था की प्रतीक है, जो मुण्डन संस्कार के समय स्थापित की जाती है । यज्ञोपवीत सांस्कृतिक मूल्य