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षोडशोपचार पूजन (पुरुष सूक्त)

षोडशोपचार पूजन पुरुष सूक्त विधि - कर्मकांड भास्कर

मूल स्रोत: पृष्ठ 91–93

षोडशोपचार पूजन (पुरुष सूक्त)

॥ पुरुष सूक्त ॥ सूत्र संकेत- पुरुष सूक्त का प्रयोग विशेष पूजन के क्रम में किया जाता है । षोडशोपचार पूजन के एक-एक उपचार के साथ क्रमशः एक-एक मन्त्र बोला जाता है । जहाँ कहीं भी किसी देवशक्ति का पूजन विस्तार से करना हो, तो पुरुष सूक्त के मन्त्रों के साथ षोडशोपचार पूजन करा दिया जाता है । पंचोपचार पूजन में भी इस सूक्त से सम्बन्धित मन्त्रों का प्रयोग किया जा सकता है । यज्ञादि के विस्तृत देवपूजन में, पर्वों पर, पर्व से सम्बन्धित देव शक्ति के पूजन में बहुधा इसका प्रयोग किया जाता है । वातावरण में पवित्रता और श्रद्धा के संचार के लिए भी पुरुष सूक्त का पाठ सधे हुए कण्ठ वाले व्यक्ति सामूहिक रूप से करते हैं । शिक्षण एवं प्रेरणा- पुरुष सूक्त में परमात्मा की विराट्‌ सत्ता का वर्णन किया गया है । उस महत्‌ चेतना के विस्तार के संकल्प से ही इस जड़- चेतन की सृष्टि हुई है किसी भी प्रतीक देव विग्रह का पूजन करते हुए यही चिन्तन उभरता रहता है कि हम उसी एक विराट्‌ , सनातन, अविनाशी का पूजन कर रहे हैं । क्रिया और भावना-- पुरुष सूक्त से पूजन प्रारम्भ कराने के पूर्व उपस्थित श्रद्धालुओं को उक्त सिद्धान्त बतलाया जाना चाहिए , ताकि पूजन में उनका भी भाव-संयोग हो सके । यदि सम्भव हो, तो सभी के हाथ में अथवा पूजन वेदी के निकटवर्ती प्रतिनिधियों के हाथ में अक्षत- पुष्प दे देने चाहिए । पूरे पूजन के साथ हाथ में रखें, भाव पूजन में सम्मिलित रहें और वे पुष्पांजलि के साथ उन्हें अर्पित करें । भावना करें कि हमारे पास जो कुछ भी है, उसी का दिया हुआ है । उसके विराट्‌ स्वरूप एवं उद्देश्यों को हम पहचानें और उनके निमित्त अपने साधनों को- क्षमताओं को अर्पित करते हुए उन्हें सार्थक करें, धन्य बनाएँ । उस सर्वव्यापी को, उसके आदर्शों को हर कदम पर, हर स्तर पर, हर प्रसंग में प्रत्यक्ष की तरह देखते हुए श्रद्धासिक्त होकर पूजन भाव से सक्रिय रहें । उसके दिये साधनों को उसके उद्देश्यों में लगाने में कृपणता न बरतें, उदार भक्ति-भावना का परिचय-प्रमाण दें । सम्बन्धित सामग्री हाथ में लेकर मन्त्र बोला जाए । मन्त्र पूरा होने पर

जिस देव शक्ति का पूजन है, उसका नाम लेते हुए षोडशोपचार के आधार पर स्थापयामि, समर्पयामि आदि कहते हुए उसे चढ़ाते चलें । १- आवाहनम्‌ ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः; सहस्राक्षः सहस्रपात्‌ । स भूमिं छं सर्वतस्पृत्वा, अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्‌ ॥ २- आसनम्‌ ॐ पुरुषऽएवेद छं सर्वं , यद्भूतं यच्च भाव्यम्‌। उतामृतत्वस्येशानो, यदन्नेनातिरोहति ॥ ३- पाद्यम्‌ ॐ एतावानस्य महिमातो, ज्यायाँश्च पुरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ४- अर्घ्यम्‌ ॐ त्रिपादूर्ध्व ऽ उदैत्पुरुषः, पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो व्यक्रामत्‌, साशनानशने अभि ॥ ५- आचमनम्‌ ॐ ततो विराडजायत, विराजो अधिपूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत, पश्चाद्‌ भूमिमथो पुरः ॥ ६- स्नानम्‌ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः, सम्भृतं पृषदाज्यम्‌ । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यान्‌, आरण्या ग्राम्याश्च ये ॥ ७- वस्त्रम्‌ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽ, ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दा छं सि जज्ञिरे तस्माद्‌, यजुस्तस्मादजायत ॥ ८-यज्ञोपवीतम्‌ ॐ तस्मादश्वा ऽ अजायन्त, ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्‌, तस्माज्जाता ऽ अजावयः ॥

९- गन्धम्‌ ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्‌, पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवाऽअयजन्त, साध्या ऽ ऋषयश्च ये ॥ १०- पुष्पाणि ॐ यत्‌ पुरुषं व्यदधुः, कतिधा व्यकल्पयन्‌ ॥ मुखं किमस्यासीत्किं बाहू, किमूरू पादा उच्येते ॥ ११- धूपम्‌ ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्, बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां छं शूद्रो अजायत ॥ १२- दीपम्‌ ॐ चन्द्रमा मनसो जातः, चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च, मुखादग्निरजायत ॥ १३- नैवेद्यम्‌ ॐ नाभ्याऽ आसीदन्तरिक्ष छं, शीर्ष्णो द्यौः समवर्त्तत। पदभ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्‌ , तथा लोकाँर अकल्पयन्‌ ॥ १४- ताम्बूलपूगीफलानि ॐ यत्पुरुषेण हविषा, देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं, ग्रीष्म ऽ इध्मःशरद्धविः ॥ १५- दक्षिणा ॐ सप्तास्यासन् परिधयः, त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽ, अबध्नन्‌ पुरुषं पशुम्‌ ॥ १६- मंत्र पुष्पांजलिः ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्‌। ते ह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥