गृह प्रवेश-वास्तु शान्ति प्रयोग विधि - कर्मकांड भास्कर
मूल स्रोत: पृष्ठ 118–119

॥ गृह प्रवेश-वास्तु शान्ति प्रयोग ॥ नये-पुराने निर्मित मकान, दुकान आदि में निवास प्रारम्भ करने के पूर्व या रहने के समय गृह प्रवेश या वास्तु शान्ति का प्रयोग सम्पन्न करना प्रायः अनिवार्य सा माना जाता है । इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए इस कर्मकाण्ड की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की जा रही है- सर्वप्रथम षट्कर्म, तिलक, रक्षासूत्र, कलशपूजन, दीपपूजन, देवावाहन- पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान तक की प्रक्रिया पूरी करके पूजावेदी पर वास्तु पुरुष का आवाहन-पूजन सम्पन्न करें । ॥वास्तुपुरुषपूजन ॥ प्रत्येक वस्तु- पदार्थ में एक देवशक्ति सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती है, जिसे उस वस्तु-पदार्थ का अधिष्ठाता देवता कहा जाता है। इस प्रकार मकान-दुकान आदि के अधिष्ठाता देवता की अनुकूलता प्राप्त करने एवं उस स्थान की प्रतिकूलता दूर करने के लिए वास्तुपुरुष (अधिष्ठाता देवता) का अक्षत-पुष्प से आवाहन-स्थापन करें- ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीहि अस्मान्, स्वावेशो अनमीवो भवा नः । यत्वे महे प्रतितन्नो जुषस्व, शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ - ऋ० ७.५४.१ ॐ भूर्भुवः स्वः वास्तुपुरुषाय नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि । गन्धाक्षतं पुष्पाणि, धूपं, दीपं, नैवेद्यं समर्पयामि । ततो नमस्कारं करोमि- ॐ विशन्तु भूतले नागाः, लोकपालाश्च सर्वतः । मण्डलेऽत्रावतिष्ठन्तु , ह्यायुर्बलकराः सदा ॥ वास्तुपुरुष देवेश ! सर्वविघ्न- विदारण । शान्तिं कुरु सुखं देहि, यज्ञेऽस्मिन्मम सर्वदा ॥
तत्पश्चात् अग्निस्थापन, प्रदीपन आदि करते हुए २४ बार गायत्री मन्त्र की आहुति समर्पित करें । इसके बाद खीर, मिष्टान्न या केवल घृत से ५ बार विशेष आहुति समर्पित करें । ॥ विशेषाहुतिः ॥ १. ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीहि अस्मान्, स्वावेशो अनमीवो भवा नः । यत्वे महे प्रतितन्नो जुषस्व, शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे स्वाहा । इदं वास्तोष्पतये इदं न मम ॥ - ऋ० ७.५४.१ २. ॐ वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि, गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो । अजरासस्ते सख्ये स्याम पितेव, पुत्रान् प्रतिनो जुषस्व स्वाहा । इदं वास्तोष्पतये इदं न मम ॥ - ऋ० ७.५४.२ ३. ॐ वास्तोष्पते शग्मया संसदा, ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या । पाहि क्षेम उत योगे वरं नो, यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः स्वाहा । इदं वास्तोष्पतये इदं न मम ॥ - ऋ० ७.५४.३ ४. ॐ अमीवहा वास्तोष्पते, विश्वा रूपाण्याविशन् । सखा सुशेव एधि नः स्वाहा ॥ इदं वास्तोष्पतये इदं न मम ॥- ऋ० ७.५५.१ ५. ॐ वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणां, सत्रं सोम्यानाम् । द्रप्सो भेत्ता पुरां शश्वतीनाम्, इन्द्रो मुनीनां सखा स्वाहा । इदं वास्तोष्पतये इदं न मम ॥ - ऋ० ८.१७.१४ तत्पश्चात् पूर्णाहुति, वसोर्धारा, आरती आदि का क्रम सम्पन्न करते हुए कार्यक्रम पूर्ण किया जाए ।