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कलश स्थापन-गौरीगणेश पूजन

कलश स्थापन गौरीगणेश पूजन विधि - कर्मकांड भास्कर

मूल स्रोत: पृष्ठ 82–84

कलश स्थापन-गौरीगणेश पूजन

कलशस्थापन ॥ सूत्र संकेत- कलश की स्थापना और पूजा लगभग प्रत्येक कर्मकाण्ड में की जाती है । सामान्य रूप से कलश पहले से तैयार रखा रहता है और पूजन क्रम में उसका पूजन करा दिया जाता है । यदि कहीं इस प्रकरण का विस्तार करना आवश्यक लगे, तो स्थापना के लिए नीचे दिये गये पाँच उपचार कराये जाते हैं । यह उपचार पूर्ण होने पर कलश प्रार्थना प्रयोग करके आगे बढ़ा जाता है । यह विस्तृत कलश स्थापन, प्राण प्रतिष्ठा, गृह प्रवेश, गृह शान्ति, नवरात्रि जैसे प्रकरणों में जोड़ा जा सकता है । बड़े यज्ञों में देव पूजन के पूर्व प्रधान कलश अथवा पंच वेदिकाओं के पाँचों कलशों पर एक साथ यह उपचार कराये जा सकते हैं । स्थापना प्रसंग के लिए रँगा हुआ कलश, उसके नीचे रखने का घेरा (ईडली), अलग पात्र में शुद्ध जल, कलावा, मंगल द्रव्य, नारियल पहले से तैयार रखने चाहिए । शिक्षण एवं प्रेरणा-- कलश को सभी देव शक्तियों, तीर्थों आदि का संयुक्त प्रतीक मानकर, उसे स्थापित-पूजित किया जाता है । कलश को यह गौरव मिला है- उसकी धारण करने की क्षमता-पात्रता से । घट स्थापन के साथ स्मरण रखा जाना चाहिए कि हर व्यक्ति, हर क्षेत्र, हर स्थान में धारण करने की अपनी क्षमता होती है । उसे सजाया-सँवारा जाना चाहिए । उसके लिए उपयुक्त आधार दिया जाना चाहिए । पात्र में पवित्र जल भरते हैं । श्रद्धा और पवित्रता से भरी- पूरी पात्रता ही धन्य होती है । उसमें मंगल द्रव्य डालते हैं । पात्रता को मंगलमय गुणों से विभूषित किया जाना चाहिए । कलावा बाँधने का अर्थ है- पात्रता को आदर्शवादिता से अनुबन्धित करना । नारियल-श्रीफल, सुख- सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है । उसकी स्थापना का तात्पर्य है कि ऐसी व्यवस्थित पात्रता पर ही सुख-सौभाग्य स्थिर रहते हैं । क्रिया और भावना- पाँचों उपचार एक-एक करके मन्त्रों के साथ सम्पन्न करें, उनके अनुरूप भावना सभी बनाये रखें । (१) घटस्थापन- मन्त्रोच्चार के साथ कलश को निर्धारित स्थान या

चौकी आदि पर स्थापित करें । भावना करें कि अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र की पात्रता प्रभु चरणों में स्थापित कर रहे हैं । ॐ आजिघ्र कलशं मह्या, त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व, सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा, पयस्वतीः पुनर्मा विशताद्रयि: । ८.४२ (२) जलपूरण- मन्त्रोच्चार के साथ सावधानी से शुद्ध जल कलश में भरें। भावना करें समर्पित पात्रता का खालीपन श्रद्धा-संवेदना से, तरलता-सरलता से लबालब भर रहा है । ॐ वरुणस्योत्कम्भनमसि, वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो, वरुणस्यऽ ऋतसदन्यसि, वरुणस्यऽ ऋत सदनमसि, वरुणस्यऽ ऋतसदनमासीद्‌ ॥ -४.३६ (३) मंगलद्रव्यस्थापन- मन्त्र के साथ कलश में दूर्वा-कुश, पूगीफल-सुपारी, पुष्प और पल्लव डालें । भावना करें स्थान और व्यक्तित्व में छिपी पात्रता में दूर्वा जैसी जीवनी शक्ति, कुश जैसी प्रखरता, सुपारी जैसी गुणयुक्त स्थिरता, पुष्प जैसा उल्लास तथा पल्लवों जैसी सरलता, सादगी का संचार किया जा रहा है । ॐ त्वां गन्धर्वाऽअखनेस्त्वाम्‌, इन्द्रस्त्वां बृहस्पति: । त्वामोषधे सोमो राजा, विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत ॥ १२.९८ (४) सूत्रवेष्टन-- मन्त्र के साथ कलश में कलावा लपेटे । भावना करें पात्रता को अवांछनीयता से जुड़ने का अवसर न देकर उसे आदर्शवादिता के साथ अनुबन्धित कर रहे हैं, ईश अनुशासन में बाँध रहे हैं । ॐ सुजातो ज्योतिषा सह, शर्मवरूथ माऽ सदत्स्वः । वासोऽ अग्ने विश्वरूप छं, सं व्ययस्व विभावसो ॥ - ११.४० (५) नारिकेल संस्थापन- मन्त्र के साथ कलश के ऊपर नारियल रखें । भावना करें कि इष्ट के चरणों में समर्पित, पात्रता सुख - सौभाग्य की आधार बन रही है । यह दिव्य कलश जहाँ स्थापित हुआ है, वहाँ की जड़- चेतना, सारी पात्रता इन्हीं संस्कारों से भर रही है ।

तत्पश्चात्‌ ॐ मनोजूतिर्जुषताम्‌ ० मन्त्र से( दोनों हाथ लगाकर) प्रतिष्ठा करें । बाद में तत्त्वायामि० मंत्र का प्रयोग करते हुए पंचोपचार पूजन करें और कलशस्य मुखे विष्णुः ० इत्यादि मन्त्रों से प्रार्थना करें । ॥ गणेश-गौरीपूजन ॥ कलश पूजन के साथ गणेश-गौरी पूजन की भी परम्परा अनेक स्थानों पर पायी जाती है । वास्तव में यह संक्षिप्तीकरण की पद्धति है । कलश पूजन के साथ गणपति को सभी देव शक्तियों का प्रतिनिधि तथा गौरी को सभी मातृशक्तियों की प्रतीक मानकर पूजन किया जाता है । यदि इस प्रकार का संक्षिप्त पूजन करना हो, तो इस पुस्तक के प्रथम भाग में दिये देवपूजन प्रसंग के आरम्भिक चार मन्त्रों से काम चल सकता है । उस स्थिति में क्रमशः गुरु तत्त्व का गुरुब्रह्मा.... आद्यशक्ति गायत्री को आयातु वरदे देवि.... गणपति का अभीप्सितार्थ सिद्ध्यर्थ....... तथा गौरी का सर्व मंगल मांगल्ये...... मन्त्र से आवाहन करके पंचोपचार पूजन करा देना चाहिए ।