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दशविध स्नान

दशविध स्नान विधि - कर्मकांड भास्कर

मूल स्रोत: पृष्ठ 107–109

दशविध स्नान

॥ दशविध स्नान ॥ सूत्र संकेत- दस स्नान का प्रयोग देव प्रतिमाओं की स्थापना के समय, श्रावणी उपाकर्म, वानप्रस्थ संस्कार तथा प्रायश्चित्त विधानों में किया जाता है, उनमें यह प्रकरण ले लेना चाहिए । क्रम व्यवस्था- यज्ञ या संस्कार स्थल से कुछ हटकर दस स्नान की व्यवस्था करनी चाहिए । इन स्नानों में (१) भस्म (२) मिट्टी (३) गोबर (४) गोमूत्र (५) गो-दुग्ध (६) गो-दधि (७) गो-घृत (८) सर्वौषधि (हल्दी) (९) कुश (१०) मधु- ये दस वस्तुएँ होती हैं । क्रमशः एक-एक वस्तु से स्नान करते समय बायीं हथेली पर भस्म आदि पदार्थ रखें, उसमें थोड़ा पानी डालें । दोनों हथेलियों से उसे मिलाएँ । मिलाते समय निर्धारित मन्त्र बोलें, फिर बायें हाथ से कमर से नीचे के अंगों पर और दायें हाथ से कमर से ऊपर के अंगों पर उसका लेपन करें । इसके बाद स्वच्छ जल से स्नान कर डालें । इसी प्रकार अन्य दस वस्तुओं से स्नान करें । इसके पश्चात्‌ अन्तिम बार शुद्ध जल से स्नान कर शरीर को भली प्रकार पोंछ कर पीले वस्त्र धारण करें । ये दस स्नान अब तक के किये हुए पापों का प्रायश्चित्त करने तथा अभिनव जीवन में प्रवेश करने के लिए हैं । जैसे साँप केंचुली छोड़कर नई त्वचा प्राप्त करता है, वैसे इसमें पिछले ढर्रे को समाप्त करके उत्कृष्ट जीवन जीने का व्रत लेते हैं। भावना और प्रेरणा- (१) भस्म से स्नान की भावना यह है कि शरीर भस्मान्त है । कभी भी मृत्यु आ सकती है, इसलिए सम्भावित मृत्यु को स्मरण रखते हुए, भावी मरणोत्तर जीवन की सुख-शान्ति के लिए तैयारी आरम्भ की जा रही है । (२) मिट्टी से स्नान का मतलब है कि जिस मातृभूमि का असीम ऋण अपने ऊपर है, उससे उऋण होने के लिए देशभक्ति का, मातृभूमि की सेवा का व्रत ग्रहण किया जा रहा है । (३) गोबर से तात्पर्य है- गोबर की तरह शरीर को खाद बनाकर संसार को फलने-फूलने के लिए उत्सर्ग करना । (४) गोमूत्र क्षार प्रधान रहने से मलिनता नाशक माना गया है । रोग कीटाणुओं को नष्ट करता है । इस स्नान में शारीरिक और मानसिक दोष-दुर्गुणों को हटाकर भीतरी और बाहरी स्वच्छता की नीति हृदयंगम करनी चाहिए । (५) दुग्ध स्नान से जीवन को दूध-सा धवल, स्वच्छ, निर्मल, सफेद, उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा है । (६) दधि स्नान का अर्थ है- नियन्त्रित होना, दूध पतला

होने से इधर-उधर ढुलकता है, पर दही गाढ़ा होकर स्थिर बन जाता है । भाव करें- अब अपनी रीति-नीति दही के समान स्थिर रहे । (७) घृत स्नान की भावना है चिकनाई । जीवन क्रम को चिकना-सरल बनाना, जीवन में प्यार की प्रचुरता भरे रहना । (८) सर्वौषधि ( हरिद्रा) स्नान का अर्थ है- अवांछनीय तत्त्वों से संघर्ष । हल्दी रोग-कीटाणुओं का नाश करती है, शरीर-मन में जो दोष-दुर्गुण हों, समाज में जो विकृतियाँ दीखें, उनसे संघर्ष करने को तत्पर होना । (९) कुशाओं के स्पर्श का अर्थ है- तीक्ष्णतायुक्त रहना । अनीति के प्रति नुकीले, तीखे बने रहना । (१०) मधु स्नान का अर्थ है- समग्र मिठास । सज्जनता, मधुर भाषण आदि सबको प्रिय लगने वाले गुणों का अभ्यास । दस स्नानों का कृत्य सम्पन्न करने से दिव्य प्रभाव पड़ता है । उनके साथ समाविष्ट प्रेरणा से आन्तरिक उत्कर्ष में सहायता मिलती है । १. भस्म-स्नानम्‌ ॐ प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने। स सृज्य मातृभिष्ट्वं, ज्योतिष्मान्पुनराऽसदः ॥ १२.३८ २. मृत्तिका स्नानम्‌ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्‌। समूढमस्य पां छं सुरे स्वाहा ॥ ५.१५ ३. गोमय-स्नानम्‌ ॐ मा नस्तोके तनये मा नऽआयुषि, मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । मा नो वीरान्‌ रुद्र भामिनो, वधीर्हविष्मन्तः सदयित्‌ त्वा हवामहे । १६.९६ ४. गोमूत्र-स्नानम्‌ ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥ ३.३५ ५. दुग्ध-स्नानम्‌ ॐ आप्यायस्व समेतु ते, विश्वतः सोम वृष्ण्यम्‌ भवा वाजस्य संगथे । - १२.११२

६. दधि-स्नानम्‌ ॐ दधिक्राव्णोऽअकारिषं, जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करत् प्रणऽ, आयूंषि तारिषत्‌ ॥ - २३.३२ ७. घृत-स्नानम्‌ ॐ घृतं घृतपावानः, पिबत वसां वसापावानः । पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा । दिशः प्रदिशऽ आदिशो विदिशऽ, उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा ॥ ६.१९ ८. सर्वौषधि-स्नानम्‌ ॐ ओषधयः समवदन्त, सोमेन सह राज्ञा । यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं, राजन्‌ पारयामसि ॥ - १२.९६ ९. कुशोदक-स्नानम्‌ ॐ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोः, बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्‌। सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रिये दधामि, बृहस्पतेष्ट्वा साम्राज्येनाभिषिञ्चाम्यसौ ॥ ९.३० १०. मधु-स्नानम्‌ ॐ मधु वाता ऽ ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः । ॐ मधु नक्तमुतोषसो, मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता । ॐ मधुमान्नो वनस्पतिः, मधुमाँऽअस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥ - १३.२७-२८-२९ शुद्धोदक-स्नानम्‌ अन्त में समग्र शुद्धता के लिए शुद्ध जल से सिंचन-स्नान किया जाए-- ॐ शुद्धवालः , पणिवालस्तऽआश्चिनाः, श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते, रुद्राय पशुपतये कर्णा यामाऽ, अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः ॥ - २४.३