वात-रोग एवं बाहु-पीड़ा नाशक मंत्र (हनुमान बाहुक)
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु। भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
समुद्र को लांघने वाले, सीता जी का शोक हरने वाले, बाल-सूर्य के समान लाल देह वाले, विशाल भुजाओं और भयानक मूर्ति वाले, जो स्वयं काल के भी काल हैं (उन हनुमान जी को नमन)।
इस मंत्र से क्या होगा?
वात रोग (Arthritis), बाहु-पीड़ा (Arm/Shoulder pain) और शारीरिक अंगों के भयंकर कष्टों का निवारण
(तुलसीदास जी ने अपनी बाहु-पीड़ा शमन हेतु इसकी रचना की थी)
विस्तृत लाभ
वात रोग (Arthritis), बाहु-पीड़ा (Arm/Shoulder pain) और शारीरिक अंगों के भयंकर कष्टों का निवारण। (तुलसीदास जी ने अपनी बाहु-पीड़ा शमन हेतु इसकी रचना की थी) 17।
जप काल
जल का पात्र सामने रखकर 40 दिन तक नित्य प्रातः काल पाठ 17।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः। (स्वरूप: ह्रीं-स्वरूपा सरस्वती | लाभ: मस्तिष्क और सहस्रार चक्र की सभी दिशाओं से रक्षा | अर्थ: ह्रीं बीज रूपी सरस्वती मेरे सिर की सब ओर से रक्षा करें) 8
ॐ धूम्रवर्णाय नमः
ॐ नं रीं नित्यतृप्तधाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै नमः
ॐ वृन्दारध्यायै नमः
ॐ अक्षोभ्याय नमः