देवी सूक्त मंत्र - 6
अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ। अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
ब्रह्मद्वेषी (सत्य के विरोधी) राक्षसों का वध करने के लिए मैं ही भगवान रुद्र के धनुष पर डोरी चढ़ाती हूँ। मैं ही सज्जनों के लिए शत्रुओं से युद्ध करती हूँ और मैं ही द्यावा-पृथ्वी में व्याप्त हूँ 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय
विस्तृत लाभ
दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ वेदमन्त्राभिषेचिताय नमः
ॐ राम रामाय नमः
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति साधकः। राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिः स्यात् प्रेमलक्षणा॥
ॐ हनुमान पहलवान पहलवान, बरस बारह का जबान, हाथ में लड्डू मुख में पान, खेल खेल गढ़ लंका के चौगान, अंजनी का पूत, राम का दूत, छिन में कीलौ नौ खंड का भूत, जाग जाग हड़मान हुँकाला, ताती लोहा लंकाला, शीश जटा डग डेरू उमर गाजे, वज्र की कोठड़ी ब्रज का ताला, आगे अर्जुन पीछे भीम, चोर नार चंपे ने सींण, अजरा झरे भरया भरे, ई घट पिंड की रक्षा राजा रामचंद्र जी लक्ष्मण कुँवर हड़मान करें।
ॐ महाविष्णवे नमः
अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च मे पर्वताश्च मे...