विस्तृत उत्तर
अनुष्ठान के दौरान साधक को एक अत्यंत कठोर आचार-संहिता (Code of Conduct) का पालन करना होता है:
१. आभ्यंतर एवं बाह्य शुद्धि: नित्य सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र स्नान करना तथा स्वच्छ एवं धुले हुए वस्त्र (प्राथमिकता से सफेद या पीले रंग के बिना सिले वस्त्र जैसे धोती) धारण करने चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध या कामुक विचार नहीं आने चाहिए।
२. ब्रह्मचर्य का पालन: अनुष्ठान के दिनों में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। यह शारीरिक और मानसिक ओजस (Bio-electricity) के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
३. सात्विक आहार: आहार पूर्णतः सात्विक होना चाहिए। गरिष्ठ भोजन, प्याज और लहसुन का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। कुछ साधक केवल फलाहार या एक समय के सात्विक भोजन पर निर्भर रहते हैं।
४. मांस एवं मदिरा का सर्वथा निषेध: मांस, मदिरा (Alcohol), और अन्य सभी प्रकार के व्यसनों का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। तामसिक प्रवृत्तियां और आहार मंत्र की सात्विक और उपचारात्मक ऊर्जा को तुरंत नष्ट कर देते हैं।
५. भूमि शयन एवं मौन: ऊर्जा के भूमिगत (Grounding) होने से बचने के लिए केवल कुशा या ऊनी कंबल बिछाकर शयन करना चाहिए। व्यर्थ के प्रलाप और असत्य भाषण से बचने के लिए न्यूनतम संवाद या मौन (Mauna) का पालन उचित माना गया है।




