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मंदिर परम्परा📜 आगम शास्त्र, शिल्पशास्त्र, मानसार, अग्निपुराण (मूर्ति वर्गीकरण)3 मिनट पठन

मंदिर में चल मूर्ति और अचल मूर्ति में क्या भेद है?

संक्षिप्त उत्तर

अचल (स्थावर): स्थायी — गर्भगृह में, पत्थर/भारी, कभी न हिलाएँ, स्थायी प्राण प्रतिष्ठा। चल (जंगम): गतिशील — उत्सव/शोभायात्रा/घर, हल्की धातु, ले जा सकें। उपप्रकार: उत्सव, स्नपन, बलि, शयन, गृह, विसर्जन मूर्ति। तीसरा: चलाचल (सामान्यतः स्थिर, विशेष पर हिलाएँ)। घर: चल — परंतु निश्चित स्थान पर रखें।

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विस्तृत उत्तर

भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम शास्त्र में मूर्तियों को 'चल' (Movable) और 'अचल' (Immovable) दो मूल श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

अचल मूर्ति (स्थावर/ध्रुव)

1परिभाषा

वह मूर्ति जो एक बार स्थापित होने के बाद कभी स्थानांतरित नहीं की जाती = अचल। 'स्थावर' (स्थिर) या 'ध्रुव' (अटल) भी कहते हैं।

2विशेषताएँ

  • गर्भगृह में स्थायी स्थापना
  • प्राण प्रतिष्ठित — एक बार, स्थायी
  • भारी — पत्थर (ग्रेनाइट/संगमरमर) या भारी धातु
  • भूमि/पीठिका से जुड़ी
  • हिलाना/स्थानांतरित करना = वर्जित (चैतन्य भंग)

3उदाहरण

  • मंदिर गर्भगृह की मूल मूर्ति (मूलवर)
  • शिवलिंग (स्थायी — जमीन से जुड़ा)
  • स्वयम्भू मूर्तियाँ (प्राकृतिक)

चल मूर्ति (जंगम)

4परिभाषा

वह मूर्ति जो स्थानांतरित/ले जाई जा सकती है = चल। 'जंगम' (गतिशील) भी कहते हैं।

5विशेषताएँ

  • उठाकर ले जाने योग्य — हल्की
  • प्रायः धातु (पंचधातु/अष्टधातु/पीतल/ताँबा)
  • शोभायात्रा, उत्सव, रथ यात्रा में प्रयुक्त
  • घर पूजा की मूर्तियाँ भी चल

6उपप्रकार

  • उत्सव मूर्ति — मंदिर उत्सवों के लिए
  • स्नपन मूर्ति — अभिषेक के लिए विशेष
  • बलि मूर्ति — बलि पीठ पर रखी जाने वाली
  • शयन मूर्ति — रात्रि शयन के लिए
  • गृह मूर्ति — घर पूजा के लिए
  • विसर्जन मूर्ति — उत्सव बाद विसर्जित (गणेश/दुर्गा)

मुख्य भेद

| विषय | अचल (स्थावर) | चल (जंगम) |

|---|---|---|

| स्थिरता | स्थायी — कभी न हिलाएँ | गतिशील — ले जा सकें |

| सामग्री | पत्थर/भारी धातु | हल्की धातु/मिट्टी |

| प्राण प्रतिष्ठा | स्थायी + विस्तृत | सरल / पुनः सम्भव |

| स्थान | गर्भगृह (एक स्थान) | कहीं भी |

| उपयोग | नित्य दर्शन | उत्सव/शोभायात्रा/घर |

| खंडन पर | विसर्जन+नवीन | विसर्जन+नवीन |

शिल्पशास्त्र में तीसरा प्रकार — 'चलाचल'

वह मूर्ति जो सामान्यतः स्थिर रहे परंतु विशेष अवसरों पर हिलाई जा सके = चलाचल। कुछ विद्वान उत्सव मूर्ति को इसी श्रेणी में रखते हैं।

व्यावहारिक महत्व

घर में रखी छोटी मूर्ति = चल। परंतु एक बार प्राण प्रतिष्ठा हो जाए तो उसे भी अनावश्यक इधर-उधर न करें — एक निश्चित स्थान पर रखें।

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शास्त्रीय स्रोत
आगम शास्त्र, शिल्पशास्त्र, मानसार, अग्निपुराण (मूर्ति वर्गीकरण)
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