विस्तृत उत्तर
भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम शास्त्र में मूर्तियों को 'चल' (Movable) और 'अचल' (Immovable) दो मूल श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
अचल मूर्ति (स्थावर/ध्रुव)
1परिभाषा
वह मूर्ति जो एक बार स्थापित होने के बाद कभी स्थानांतरित नहीं की जाती = अचल। 'स्थावर' (स्थिर) या 'ध्रुव' (अटल) भी कहते हैं।
2विशेषताएँ
- ▸गर्भगृह में स्थायी स्थापना
- ▸प्राण प्रतिष्ठित — एक बार, स्थायी
- ▸भारी — पत्थर (ग्रेनाइट/संगमरमर) या भारी धातु
- ▸भूमि/पीठिका से जुड़ी
- ▸हिलाना/स्थानांतरित करना = वर्जित (चैतन्य भंग)
3उदाहरण
- ▸मंदिर गर्भगृह की मूल मूर्ति (मूलवर)
- ▸शिवलिंग (स्थायी — जमीन से जुड़ा)
- ▸स्वयम्भू मूर्तियाँ (प्राकृतिक)
चल मूर्ति (जंगम)
4परिभाषा
वह मूर्ति जो स्थानांतरित/ले जाई जा सकती है = चल। 'जंगम' (गतिशील) भी कहते हैं।
5विशेषताएँ
- ▸उठाकर ले जाने योग्य — हल्की
- ▸प्रायः धातु (पंचधातु/अष्टधातु/पीतल/ताँबा)
- ▸शोभायात्रा, उत्सव, रथ यात्रा में प्रयुक्त
- ▸घर पूजा की मूर्तियाँ भी चल
6उपप्रकार
- ▸उत्सव मूर्ति — मंदिर उत्सवों के लिए
- ▸स्नपन मूर्ति — अभिषेक के लिए विशेष
- ▸बलि मूर्ति — बलि पीठ पर रखी जाने वाली
- ▸शयन मूर्ति — रात्रि शयन के लिए
- ▸गृह मूर्ति — घर पूजा के लिए
- ▸विसर्जन मूर्ति — उत्सव बाद विसर्जित (गणेश/दुर्गा)
मुख्य भेद
| विषय | अचल (स्थावर) | चल (जंगम) |
|---|---|---|
| स्थिरता | स्थायी — कभी न हिलाएँ | गतिशील — ले जा सकें |
| सामग्री | पत्थर/भारी धातु | हल्की धातु/मिट्टी |
| प्राण प्रतिष्ठा | स्थायी + विस्तृत | सरल / पुनः सम्भव |
| स्थान | गर्भगृह (एक स्थान) | कहीं भी |
| उपयोग | नित्य दर्शन | उत्सव/शोभायात्रा/घर |
| खंडन पर | विसर्जन+नवीन | विसर्जन+नवीन |
शिल्पशास्त्र में तीसरा प्रकार — 'चलाचल'
वह मूर्ति जो सामान्यतः स्थिर रहे परंतु विशेष अवसरों पर हिलाई जा सके = चलाचल। कुछ विद्वान उत्सव मूर्ति को इसी श्रेणी में रखते हैं।
व्यावहारिक महत्व
घर में रखी छोटी मूर्ति = चल। परंतु एक बार प्राण प्रतिष्ठा हो जाए तो उसे भी अनावश्यक इधर-उधर न करें — एक निश्चित स्थान पर रखें।





