विस्तृत उत्तर
वसंत पंचमी के अनुष्ठान में पीले रंग (पीत-वर्ण) की प्रधानता केवल एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं है; इसके पीछे अत्यंत सुदृढ़ दार्शनिक, ज्योतिषीय और मनोवैज्ञानिक तर्क विद्यमान हैं।
सत्त्व गुण और आध्यात्मिक प्रतीकवाद: श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, संपूर्ण प्रकृति तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—से निर्मित है। पीला रंग विशुद्ध सत्त्व गुण का परिचायक है। जहाँ लाल रंग उग्रता और नीला रंग अनंत विस्तार का प्रतीक है, वहीं पीला रंग मन की स्पष्टता, शांति, पवित्रता और भौतिक इच्छाओं से विरक्ति को दर्शाता है। देवी सरस्वती को अक्सर श्वेत या हल्के पीले वस्त्रों में कमल पर विराजमान दिखाया जाता है, जो अज्ञानता के अंधकार पर ज्ञान के प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव: वसंत ऋतु में खेतों में पीली सरसों का खिलना इस बात का सूचक है कि शीत ऋतु की जड़ता (Tamas) समाप्त हो गई है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, पीला रंग मस्तिष्क के सेरोटोनिन (Serotonin) स्तर को बढ़ाता है, जो उल्लास, सतर्कता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह एक ऐसा रंग है जो मन को शांत रखते हुए भी उसे अध्ययन और रचनात्मकता के लिए जागृत करता है।
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