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गायत्री यन्त्र विधानरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

गायत्री पटल दस प्रयोग और सर्वार्थ साधनकर गायत्री यन्त्र विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतागायत्री माता

गायत्री साधनागायत्री पटलगायत्री यन्त्रतांत्रिक प्रयोगरुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में '(घ) गायत्री-पटल' के अंतर्गत गायत्री-साधना से सम्बद्ध दस प्रयोग, उनके लिए सामान्य जप-हवन विधान, यन्त्र-रचना का मन्त्रोद्धार और '(ङ) सर्वार्थ-साधनकर-गायत्री-यन्त्र' का स्वरूप दिया गया है।

मूल मंत्र

गायत्री-पटल के दस प्रयोग और सर्वार्थ-साधनकर-गायत्री-यन्त्र

गायत्री-साधना से सम्बद्ध इसी पटल में दस प्रयोग भी वर्णित हैं जिनके करने से सर्वविध सिद्धि प्राप्त होती है। यथा--१. स्तम्भन,
२. मोहन, ३. मारण, ४. आकर्षण, ५. वशीकरण, ६. विद्वेषण,
७. शान्तिक, ८. पौष्टिक आदि।

मन्त्रोद्धार की विधि बतलाते हुए कहा गया है कि--

बिन्दु-त्रिकोण-दशकोण-दशार-वृत्त--
नागास्त्र-षोडशदलाढ्य-शरच्चरितम् ।
भू-मन्दिरत्रयमिदं परमार्थ-यन्त्रं,
सर्वार्थ-साधनकरं परमार्थ देव्याः ॥

(ङ) सर्वार्थ-साधनकर-गायत्री-यन्त्र

साधना विधि

स्रोत के अनुसार इन प्रयोगों के लिए एकान्त में रात्रि में पूजन, १०,००० मन्त्र जप और दशांश हवन करना कहा गया है, जिसमें घृत, पायस और चन्दन का प्रयोग हो। कार्यारम्भ के दिन विशेष नक्षत्र उपयोगी बतलाए गए हैं। साधक के जन्मनक्षत्र और जन्मदिन पर भी दस हजार गायत्री जप आवश्यक बताया गया है। यन्त्रपूजा में भूपुर, भूपुर की तीन रेखाएं, षोडश दल, अष्टदल, बाह्य दशकोण, अन्तर्दशार, त्रिकोण और बिन्दु पीठ की पूजा का विधान दिया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • स्तम्भन
  • मोहन
  • मारण
  • आकर्षण
  • वशीकरण
  • विद्वेषण
  • शान्तिक
  • पौष्टिक
  • गायत्री यन्त्रराज रचना
  • आवरण-पूजा
  • लयांगपूजा

लाभ

  • सर्वविध सिद्धि प्राप्ति का वर्णन
  • वशीकरण और आकर्षण के प्रयोग का वर्णन
  • निरोगता और आयुष्य-वृद्धि का वर्णन
  • सर्वार्थ-साधन करने वाला यन्त्र कहा गया
  • गायत्री-माता की कृपा और जपादि में शीघ्र सिद्धि का वर्णन

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

गायत्री-साधना से सम्बद्ध इसी पटल में दस प्रयोग भी वर्णित हैं जिनके करने से सर्वविध सिद्धि प्राप्त होती है। यथा--१. स्तम्भन, २. मोहन, ३. मारण, ४. आकर्षण, ५. वशीकरण, ६. विद्वेषण, ७. शान्तिक, ८. पौष्टिक आदि। इनके लिए एकान्त में रात्रि में पूजन तथा १०,००० मन्त्र जप, दशांश हवन--जिसमें घृत, पायस और चन्दन का प्रयोग किया जाए। ऐसे प्रयोगों में विभिन्न अन्य वस्तुएं, स्थान, काल, मालाएं आदि का भी स्वतन्त्र विधान है जिसे अन्य ग्रन्थों तथा गुरुजनों से जानना चाहिए। वैसे प्रयोग की दृष्टि से कार्यारम्भ के दिन विशेष नक्षत्रों का होना अधिक उपयोगी बतलाया है। जैसे शुक्रवार को पुष्य नक्षत्र के दिन प्रयोग करने से वशीकरण--आकर्षण होता है। साधक के जन्मनक्षत्र और जन्मदिन पर भी दस हजार गायत्री जप करना आवश्यक बतलाया है। इससे निरोगता और आयुष्य-वृद्धि होती है। मन्त्रोद्धार की विधि बतलाते हुए कहा गया है कि-- बिन्दु-त्रिकोण-दशकोण-दशार-वृत्त-- नागास्त्र-षोडशदलाढ्य-शरच्चरितम् । भू-मन्दिरत्रयमिदं परमार्थ-यन्त्रं, सर्वार्थ-साधनकरं परमार्थ देव्याः ॥ अर्थात्--गायत्री-यन्त्रराज की रचना में १. बिन्दु, २. त्रिकोण, ३. दशकोण, ४. दशारवृत्त, ५. अष्टदल, ६. षोडशदल तथा ८. भूपुर-त्रय की योजना करनी चाहिए। ऐसा यन्त्र सर्वार्थ-साधन करने वाला कहा गया है। इस यन्त्र की आवरण-पूजा में जो 'लयांगपूजा' का विधान है उसमें सर्वप्रथम १--भूपुर की पूजा होती है जिसमें दस दिक्पाल क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान आठों दिशाओं में तथा ऊर्ध्व में ब्रह्मा और अधोभाग में विष्णु की पूजा की जाती है। तदनन्तर २--भूपुर की तीन रेखाओं में दिव्यौध, सिद्धौध तथा मानवौध (गुरु परम्परा) की पूजा करके ३--षोडश दल में लक्ष्मी, कीर्ति, धृति, धन्या, स्थिति, शान्ति, विभा, मति, गति, भ्रान्ति, नति, वाणी, प्रभा, शोभा, क्रिया और नीति देवियों की पूजा होती है। ४. अष्टदल में ब्राह्मी, नारायणी, चण्डी, शाम्भवी, अपराजिता; कौमारी, वाराही तथा नारसिंहिका-भैरवी देवियों की रुरु, चण्ड, कराल, संहार, भीषण, कालाग्नि, उन्मत्त एवं विकराल भैरवों के साथ पूजा करने का विधान है। यन्त्र के यहां तक के भाग को 'शिवधाम' कहा गया है। इसके पश्चात् बाह्य दशकोण में--सरस्वती, शाश्वती, दुर्गा, सावित्री, ब्रह्मवादिनी, श्रीमती, कुब्जिका, चम्पा, तारिणी और विश्व-मंगला की पूजा विहित है। अन्तर्दशार में--त्रिपुरा, कालिका, तारा; सुमुखी बगलामुखी, बाला, वैखरी, तुर्या, छिन्ना तथा भुवनेश्वरी देवी की पूजा करनी चाहिए। ये दोनों चक्रभाग 'सौरधाम' माने जाते हैं। तदनन्तर त्रिकोण में गंगा, यमुना और सरस्वती की अर्चना करके बिन्दु पीठ में 'त्रिपदा गायत्री' तथा पद्मासनस्थ चतुर्मुख (ब्रह्मा) की पूजा का विधान है। यहीं त्रिकोण के चारों ओर अक्षसूत्र, पद्मलगुड और कुसुम तथा चारों वेदों की पूजा करें। इस प्रकार यन्त्रपूजा करने से गायत्री-माता की कृपा प्राप्त होती है और जपादि में शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। यन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है-- (ङ) सर्वार्थ-साधनकर-गायत्री-यन्त्र

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गायत्री पटल दस प्रयोग और सर्वार्थ साधनकर गायत्री यन्त्र विधि -रुद्रयामल तंत्र — रुद्रयामल तंत्र | Pauranik