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गायत्री पटल मन्त्रोद्धार और ध्यानरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

गायत्री पटल मूल मंत्रोद्धार ध्यान और गायत्री देवी गायत्री मंत्र -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतागायत्री

गायत्री साधनागायत्री पटलमन्त्रोद्धारध्यान मंत्ररुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में 'गायत्री-साधना और रुद्रयामल' के अंतर्गत त्रिपदा गायत्री-स्तवराज के बाद '(घ) गायत्री-पटल' नाम से यह आरम्भिक पटल, मन्त्रोद्धार, ध्यान और गायत्री देवी की गायत्री दी गई है।

मूल मंत्र

(घ) गायत्री-पटल

श्रीशैलशिखरासीनं, देवताभिर्नमस्कृतम् ।
त्रिशूल-खट्वाङ्गधरं, वराभयकरं विभुम् ॥१॥
वृषध्वजं महद्वक्त्रं, प्रसन्नं परमेश्वरम् ।
जयन्तं मनसा किञ्चिद्, ध्यानोन्मीलितलोचनम् ॥२॥
भैरवं भैरवीयुक्तं, ब्रह्मोपेन्द्रादि-सेवितम् ।
सुरासुरयुतं नित्यं, तथा मातृगणार्चितम् ॥३॥

मन्त्रोद्धार--
तारं शक्तियुतात्तिवाक्स्वरपरा लक्ष्मीं सुभीमामधां,
गायत्रीति रमा युगं च सकलां लक्ष्मी-परा युग्मकम् ।
वाणी वा सुसमर्चिता च ललना मन्त्राञ्चले धद्रुं,
गायत्र्या मनुरेष देवि ! विदितो मन्त्रैक चिन्तामणि ॥

ध्यानम्--
पञ्चवक्त्रां चतुर्हस्तां प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनाम् ।
जटा-किरीट-षट्कूटिं, त्रिपदीं च स्फुरत्-प्रभाम् ॥४९॥
अक्षसूत्राम्बुजे दिव्ये दधतीं दक्षहस्तके ।
वामे कमण्डलुं चैव वरमुद्राविभूषिताम् ॥५०॥
रत्न-कुण्डल-केयूर-हार-कङ्कण-नूपुरैः ।
शोभितां रत्नपीठस्थां गायत्रीं मोक्षदायिनीम् ॥५१॥

ॐ हूं श्रीं गायत्रीदेव्यं विद्महे चतुर्विशाक्षर्यं च धीमहि,
तन्नस्त्रिपदी प्रचोदयात् ॥ॐ श्रीं ऐं॥

बीज मंत्र

हूंश्रींऐं

साधना विधि

स्रोत में उपर्युक्त मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, त्रिष्टुप् छन्द, गायत्री देवता, तार--ॐ बीज, श्रीं शक्ति तथा भद्रिका कीलक कहा गया है। धर्मार्थकाम-मोक्ष के लिए विनियोग बताया गया है। तार आदि सभी बीजों को ब्रह्मा, विष्णु और शिवाश्रित करके षडंगन्यास तथा उपर्युक्त तीनों बीजों के षड्दीर्घरूप से देहन्यास करना चाहिए। पूजा के पश्चात् सुमुख-सम्पुट आदि चौबीस मुद्राओं का प्रदर्शन आवश्यक बतलाया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • गायत्री पटल
  • गायत्री मूल मन्त्रोद्धार
  • गायत्री ध्यान
  • गायत्री देवी गायत्री
  • षडंगन्यास
  • देहन्यास
  • चौबीस मुद्राओं का प्रदर्शन

लाभ

  • गायत्री-मन्त्र को मोक्ष-प्राप्ति का एकमात्र साधन बताया गया
  • सर्वसिद्धियों का कारण बताया गया
  • सकल आपत्तियों का वारण बताया गया
  • मन्त्र सम्बन्धी दोष और पूर्वापर क्रिया के भय से मुक्त रहते हुए भी जप करने पर सर्वसिद्धि देने का वर्णन
  • धर्मार्थकाम-मोक्ष के लिए विनियोग

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

(घ) गायत्री-पटल रुद्रयामल से संगृहीत 'गायत्री-षडङ्ग' नामक ग्रन्थ में छठे अंग के रूप में 'गायत्री-पटल' कहा गया है। इसमें सर्वप्रथम उपक्रम करते हुए कहा गया है कि-- श्रीशैलशिखरासीनं, देवताभिर्नमस्कृतम् । त्रिशूल-खट्वाङ्गधरं, वराभयकरं विभुम् ॥१॥ वृषध्वजं महद्वक्त्रं, प्रसन्नं परमेश्वरम् । जयन्तं मनसा किञ्चिद्, ध्यानोन्मीलितलोचनम् ॥२॥ भैरवं भैरवीयुक्तं, ब्रह्मोपेन्द्रादि-सेवितम् । सुरासुरयुतं नित्यं, तथा मातृगणार्चितम् ॥३॥ इस प्रकार शिवरूप भैरव के समक्ष भगवती पार्वतीस्वरूपा भैरवी ने पूछा कि भगवन् ! आप निरन्तर किसका जप करते रहते हैं? इस रहस्य को कहिये। तब भगवान् भैरव ने वेदमाता गायत्री को अपनी इष्टदेवी बतलाते हुए उसके मूलमन्त्र के जप और उसके यन्त्र-राज की पूजा, सहस्रनाम एवं स्तवराज के पाठ का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए उनके विधि-विधान को स्पष्ट किया। गायत्री-मन्त्र को मोक्ष-प्राप्ति का एकमात्र साधन, सर्वसिद्धियों का कारण तथा सकल आपत्तियों का वारण बतलाते हुए मन्त्रोद्धार इस रूप में बतलाया-- तारं शक्तियुतात्तिवाक्स्वरपरा लक्ष्मीं सुभीमामधां, गायत्रीति रमा युगं च सकलां लक्ष्मी-परा युग्मकम् । वाणी वा सुसमर्चिता च ललना मन्त्राञ्चले धद्रुं, गायत्र्या मनुरेष देवि ! विदितो मन्त्रैक चिन्तामणि ॥ पद्म के अनुसार मन्त्र का स्वरूप गुह्यगम्य है क्योंकि यह प्रचलित मन्त्र के आद्यान्त में कुछ बीजों से सम्पुटित करने से बनता है। इसके पश्चात् इस पद्य के अनुसार बनने वाले गायत्री-मन्त्र की महत्ता व्यक्त की है, जिसमें मन्त्र सम्बन्धी भिन्न-भिन्न दोष एवं पूर्वापर क्रियागत विचारों के भय से मुक्त रहते हुए भी इसका यदि जप किया जाता है, तो भी यह सर्वसिद्धि देता है, ऐसा कहा है। साथ ही इसके उत्कीलन के लिए आदि और अन्त में तीन बीज लगाकर जपने का निर्देश दिया है। इसी के साथ 'संजीवन' तथा 'सम्पुट' की विधि भी कथित है। उपर्युक्त मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, गायत्री देवता है, तार--ॐ बीज, श्रीं शक्ति तथा भद्रिका कीलक है। धर्मार्थकाम-मोक्ष के लिए विनियोग कहा गया है। तार आदि सभी बीजों को ब्रह्मा, विष्णु और शिवाश्रित करके षडंगन्यास तथा उपर्युक्त तीनों बीजों के षड्दीर्घरूप से देहन्यास करना चाहिए। इस प्रकार किए गए न्यासों से साधक देवीमय होकर सर्वविध सिद्धि को प्राप्त होता है। यहां गायत्री का ध्यान इस प्रकार वर्णित है-- पञ्चवक्त्रां चतुर्हस्तां प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनाम् । जटा-किरीट-षट्कूटिं, त्रिपदीं च स्फुरत्-प्रभाम् ॥४९॥ अक्षसूत्राम्बुजे दिव्ये दधतीं दक्षहस्तके । वामे कमण्डलुं चैव वरमुद्राविभूषिताम् ॥५०॥ रत्न-कुण्डल-केयूर-हार-कङ्कण-नूपुरैः । शोभितां रत्नपीठस्थां गायत्रीं मोक्षदायिनीम् ॥५१॥ वहीं गायत्री देवी की गायत्री भी इस प्रकार दिखलाई है-- ॐ हूं श्रीं गायत्रीदेव्यं विद्महे चतुर्विशाक्षर्यं च धीमहि, तन्नस्त्रिपदी प्रचोदयात् ॥ॐ श्रीं ऐं॥ पूजा के पश्चात् सुमुख-सम्पुट आदि चौबीस मुद्राओं का प्रदर्शन आवश्यक बतलाया है। गायत्री-साधना से सम्बद्ध इसी पटल में दस प्रयोग भी वर्णित हैं जिनके करने से सर्वविध सिद्धि प्राप्त होती है। यथा--१. स्तम्भन, १. उत्कीलन, संजीवन तथा सम्पुट की विधियां भी स्पष्ट नहीं हैं। २. अन्य तन्त्रों में जप के पश्चात् आठ--सुरभि, ज्ञान, वैराग्य, योनि, शंख, पंकज, लिंग और निर्वाण मुद्राएं दिखाने का भी आदेश है।

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