स्तोत्राष्टकम्रुद्रयामल तंत्रसंस्कृत + हिन्दी
कुण्डलिनी-स्तोत्राष्टकम्
श्रीदेवता✦ भगवती कुण्डलिनी
कुण्डलिनी साधनाप्रार्थना-स्तोत्ररुद्रयामल
मूल मंत्र
जन्मोद्धारनिरीक्षणीह तरुणी वेदादि-बीजादिमा, नित्यं चेतसि भाव्यते; भुवि कदा सद्वाक्यसञ्चारिणी। मां पातु प्रियदा स विपदं संहारयित्री धरे, धात्रि त्वं स्वयमादिदेववनिता दीनातिदीनं पशुम् ॥१॥ रक्ताभामृत चन्द्रिका लिपिमयी सर्पाकृतिनिद्रिता, जाग्रत्कूर्मसमाश्रिता भगवती त्वं मां समालोकय। मांसोद्गन्ध-कुगन्धदोषजडितं वेदादिकार्थान्वितं, स्वल्पान्यामलचन्द्रकोटि किरणनित्यं शरीरं कुरु॥२॥ सिद्धार्थो निजदोषवित् स्थलगतिर्योजयेत् विद्यया, कुण्डल्याकुलमार्गमुक्तनगरी माया-कुमार्गः श्रिया। यदेहं भजति प्रभातसमये मध्याह्नकालेऽथवा, नित्यं यः कुलकुण्डली-जय-पदाम्भोजं स सिद्धो भवेत् ॥३॥ वाय्वाकाशचतुर्दलेऽतिविमले वाञ्छाफलोन्मूलके, नित्यं सम्प्रति नित्यदेहघटिता संकेतिता भाविता। विद्याकुण्डलमानिनो स्वजननी मायाक्रिया भाव्यते, यैस्तैः सिद्धकुलोद्भवैः प्रणतिभिः सत्स्तोत्रकैः शम्भुभिः ॥४॥ वेधःशंकरमोहिनी त्रिभुवनच्छायापटोद्गामिनी, संसारादिमहाऽसुखप्रहरणी तत्र स्थिता योगिनी। सर्वग्रन्थि-विभेदिनी स्वभुजगा सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा, ब्रह्मज्ञान-विनोदिनी कुलकुटी-व्याघातिनी भाव्यते ॥५॥ वन्दे श्रीकुलकुण्डलीं त्रिवलिभिः सांगैः स्वयम्भू-प्रियं, प्रावेष्ट्याम्बर-मारचित्तचपलां बालाबलां निष्कलाम्। या देवी परिभाति वेदवदना सम्भावनी तापिनी, स्वेष्टानां शिरसि स्वयम्भू-वनिता तां भावयामि क्रियाम् ॥६॥ वाणीकोटि-मृदंगनादमदना-निःश्रेणिकोटि-ध्वनिः, प्राणेशी रसराशिमूलकमलोल्लासैक-पूर्णानना। आषाढोद्भव-मेघवाज-नियुत-ध्वान्तानना स्थायिनी, माता सा परिपातु सूक्ष्मपथगा मां योगिनां शंकरी ॥७॥ त्वामाश्रित्य नरा व्रजन्ति सहसा वैकुण्ठ-कैलासयो- रानन्दैक-विलासिनी शशिशतानन्दाननां कारणाम्। मातः श्रीकुलकुण्डलि प्रियकरे कालो-कुलोहीपनेः, तत्स्थानं प्रणमामि भद्रवनिते मामुद्धर त्वं पशुम् ॥८॥ कुण्डली-शक्ति-मार्गस्थं स्तोत्राष्टक-महाफलम्। यः पठेत् प्रातरुत्थाय स वै योगी भवेद् ध्रुवम् ॥९॥
अर्थ एवं भावार्थ
हे भगवती कुण्डलिनी ! आप वेदों के आदि बीज ओंकार के समान आकृति वाली, लाल आभा से युक्त, अमृतचन्द्रिका, जागृत कूर्मवायु का आश्रय लिये हुए, सृष्टि-स्थिति-संहार शक्ति से परिपूर्ण ब्रह्मादि देवों को मोहित करने वाली, वेदवदना, स्वयम्भूलिंग को आवेष्टित कर विराजमान, सूक्ष्ममार्ग से गमन कर सहस्रार तक पहुंचने वाली, ब्रह्मज्ञान दात्री तथा विद्युत् के समान चमक वाली हैं। आप मेरी रक्षा करें, मेरे दोषों को मिटायें, सभी ग्रंथियों का भेदन करें तथा मुझ अज्ञानी का उद्धार करें।
साधना विधि
उपर्युक्त स्तोत्र का प्रातः उठते ही कुण्डली का ध्यान करते हुए पाठ करने से योग-शक्ति की प्राप्ति होती है। पाठ के समय श्लोकों के अर्थों की भावना निम्नलिखित रूप में अवश्य करें।
प्रयोग — कब और कहाँ
- कुण्डलिनी शक्ति के प्रार्थना-स्तोत्र
- प्रातः उठते ही कुण्डली का ध्यान करते हुए पाठ
लाभ
- योग-शक्ति की प्राप्ति