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आसुरी दुर्गा मन्त्र प्रयोगरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ आसुरी दुर्गा मूल मंत्र विनियोग न्यास ध्यान और प्रयोग विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताआसुरी दुर्गा

दुर्गा साधनाआसुरी दुर्गा मंत्रतांत्रिक मंत्र प्रयोगरुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में '(घ) आसुरी-दुर्गा मन्त्र-प्रयोग' शीर्षक के अंतर्गत प्रारम्भिक परिचय, आसुरीदुर्गामन्त्र-विधान, विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादि और कर न्यास, ध्यान, मूलमन्त्र तथा जप-हवन सम्बन्धी विधि दी गई है।

मूल मंत्र

(घ) आसुरी-दुर्गा मन्त्र-प्रयोग

आसुरीदुर्गामन्त्र-विधान : विनियोग--अस्य श्री आसुरीदुर्गामन्त्रस्याङ्गिरसऋषिः विराट्छन्दः आसुरी दुर्गा देवता ॐ बीजं स्वाहा शक्तिः मम श्रीआसुरीदुर्गाप्रसादपूर्वकमभीष्टकर्मसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास--आङ्गिरसर्षये नमः (शिरसि), विराट्छन्दसे नमः (मुखे), आसुरीदुर्गादेवतायै नमः (हृदये), ॐ बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)।

कर-हृदयादि और कर न्यास--ॐ कटुके कटुकपत्रं हुं फट् स्वाहा (हृदयाय० अंगु०), सुभगे आसुरि हुं फट् स्वाहा (शिरसे० तज०), रक्ते रक्तवाससे हुं फट् स्वाहा (शिखाय० मध्यमा०), अथर्वणस्य दुहिते हुं फट् (कवचाय० अना०), अघोरे घोरकर्मकारिके हुं फट् (नेत्र० कनि०), अमुकस्य गति दह दह उपविष्टस्य गुदं दह दह सुप्तस्य मनो दह प्रबुद्धस्य हृदयं दह दह हन हन पच पच भगं दर मथ-मथ तावद् दह पच यावन्मे वशमायाति हुं फट् (अस्त्राय० करतल०)।

ध्यान--शरच्चन्द्रकान्तिवेत्रत्रिशूलं, शृणि हस्तपद्मेदधानाम्बुजस्था।
अरोणां वराकादियुक्ता पवित्रा, मुदाथर्वपुत्री करोत्वाशुनाशम्॥

मूलमन्त्र--ॐ ह्रीं कटुके कटुकपत्त्रे सुभगे आसुरि रक्ते रक्तवाससे अथर्वणदुहिते अघोरे घोरकर्मकारिके अमुकस्य गति दह दह उपविष्टस्य गुदं दह दह सुप्तस्य मनो दह दह प्रबुद्धस्य हृदयं दह दह हन हन पच पच भगं दर मथ मथ तावद् दह पच यावन्मे वशमायाति हुं फट् स्वाहा।

बीज मंत्र

ह्रींहुंफट्

साधना विधि

विनियोग के अनुसार आङ्गिरस ऋषि, विराट् छन्द, आसुरी दुर्गा देवता, ॐ बीज और स्वाहा शक्ति कही गई है। कर-हृदयादि और कर न्यास के लिए स्रोत में पहले हृदयादि और बाद में करन्यास का विधान दिया गया है। मूलमन्त्र का १० हजार जप, घृत और राजिका (राई) से हवन तथा अन्य दशांश करने का निर्देश है; प्रयोग के लिए राई के पौधे का पंचांग १०० मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित कर धूप देने का विधान दिया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • आसुरीदुर्गा मन्त्र जप
  • आसुरी दुर्गा विनियोग और न्यास
  • घृत और राजिका से हवन
  • राई के पौधे का पंचांग अभिमन्त्रण
  • शत्रुसंहारक रूप स्मरण
  • अभीष्टकर्म सिद्धि

लाभ

  • आसुरीदुर्गाप्रसाद
  • अभीष्टकर्म सिद्धि
  • शत्रुसंहारक रूप का स्मरण
  • संकटों से छूटने के मार्ग के लिए स्रोत-वर्णन
  • राई के पंचांग की धूप से वश में होने का स्रोत-वर्णन

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

(घ) आसुरी-दुर्गा मन्त्र-प्रयोग (क) प्रारम्भिक परिचय--भगवती दुर्गा की साधना के सौम्य और क्रूर दोनों ही प्रकार के मन्त्रप्रयोग यामलग्रन्थों में मिलते हैं। सौम्यभावना एवं सौम्यकर्म में साधक को विशेष कामना नहीं रहती है। वह केवल यही चाहता है कि मुझ पर माता की कृपा बनी रहे। मां की कृपा की चाह में सभी कामनाओं की पूर्ति समा जाती है। किन्तु जब कोई विशेष परिस्थिति के कारण शत्रुओं से घिर जाता है, उसकी विपरीत गति-विधियों से परेशानियां बढ़ जाती हैं तथा संकटों से छूटने का कोई मार्ग नहीं दिखाई देता तो माता के शत्रुसंहारक रूप का स्मरण करना पड़ता है। ऐसे रूपों में एक रूप है--'आसुरी दुर्गा' का। इस सम्बन्ध में वर्णन आता है--'स्कन्द-कार्तिकेय ने शिवजी से षट्कर्मों का रहस्य पूछा था तब शिवजी ने 'तन्त्रसिद्धिरनेकधा--'तन्त्रसिद्धि अनेक प्रकार की होती है' ऐसा कहकर आसुरी दुर्गा के विभिन्न स्वरूप और विभिन्न मन्त्रों का विधान बतलाया। साथ ही सहदेवी-आसुरी 'राजिका-आसुरी' आदि के प्रयोग भी दिखलाये। आसुरीदुर्गामन्त्र-विधान : विनियोग--अस्य श्री आसुरीदुर्गामन्त्रस्याङ्गिरसऋषिः विराट्छन्दः आसुरी दुर्गा देवता ॐ बीजं स्वाहा शक्तिः मम श्रीआसुरीदुर्गाप्रसादपूर्वकमभीष्टकर्मसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास--आङ्गिरसर्षये नमः (शिरसि), विराट्छन्दसे नमः (मुखे), आसुरीदुर्गादेवतायै नमः (हृदये), ॐ बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। कर-हृदयादि और कर न्यास--ॐ कटुके कटुकपत्रं हुं फट् स्वाहा (हृदयाय० अंगु०), सुभगे आसुरि हुं फट् स्वाहा (शिरसे० तज०), रक्ते रक्तवाससे हुं फट् स्वाहा (शिखाय० मध्यमा०), अथर्वणस्य दुहिते हुं फट् (कवचाय० अना०), अघोरे घोरकर्मकारिके हुं फट् (नेत्र० कनि०), अमुकस्य गति दह दह उपविष्टस्य गुदं दह दह सुप्तस्य मनो दह प्रबुद्धस्य हृदयं दह दह हन हन पच पच भगं दर मथ-मथ तावद् दह पच यावन्मे वशमायाति हुं फट् (अस्त्राय० करतल०)। १. यहां पहले हृदयादि और बाद में करन्यास का विधान है। २. यहां साध्य का नाम षष्ठीविभक्ति के एकवचन में बनाकर लें। ध्यान--शरच्चन्द्रकान्तिवेत्रत्रिशूलं, शृणि हस्तपद्मेदधानाम्बुजस्था। अरोणां वराकादियुक्ता पवित्रा, मुदाथर्वपुत्री करोत्वाशुनाशम्॥ मूलमन्त्र--ॐ ह्रीं कटुके कटुकपत्त्रे सुभगे आसुरि रक्ते रक्तवाससे अथर्वणदुहिते अघोरे घोरकर्मकारिके अमुकस्य गति दह दह उपविष्टस्य गुदं दह दह सुप्तस्य मनो दह दह प्रबुद्धस्य हृदयं दह दह हन हन पच पच भगं दर मथ मथ तावद् दह पच यावन्मे वशमायाति हुं फट् स्वाहा। इस मन्त्र का १० हजार जप, घृत और राजिका (राई) से हवन तथा अन्य दशांश करे। फिर प्रयोग के लिए राई के पौधे का पंचांग लेकर उसे १०० मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित कर के उसकी धूप से जिसको धूपित करे वह वश में होवे।

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