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भुवनेश्वरी एकाक्षरी मंत्र विधानरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ भुवनेश्वरी एकाक्षरी द्व्यक्षरी और पंचाक्षरी मंत्र विधान -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताश्रीभुवनेश्वरी

भुवनेश्वरी उपासनाशक्ति साधनातंत्र साधनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में भुवनेश्वरी का एकाक्षरी-मन्त्र विधान विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-षडङ्ग न्यास, ध्यान, द्व्यक्षरी मन्त्र और पंचाक्षरी मन्त्र सहित दिया गया है।

मूल मंत्र

विनियोग--अस्य श्री भुवनेश्वरीमन्त्रस्य शक्तिर्ऋषिर्गायत्री-
च्छन्दो भुवनेश्वरी देवता हकारो बीजम्, ईकारः शक्तिः, रेफः कीलकं
चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।

ऋष्यादिन्यास--ऋषये नमः (शिरसि) । गायत्रीच्छन्दसे नमः
(मुखे) । श्रीभुवनेश्वरी देवतायै नमः (हृदये) । हकारबीजाय नमः ।
(गुह्ये) । ईकारशक्तये नमः (पादयोः) । रेफकीलकाय नमः (नाभौ) ।
विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) ।

कर-षडङ्ग न्यास--ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः। (इन छह
बीजों से यह न्यास करें)।

ध्यान
बालरविद्युतिभिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥

तदनन्तर मानसोपचार पूजा करके 'ह्रीं' मन्त्र का जप करें ।
द्व्यक्षरीमन्त्र--हौं ॐ ह्रीं। पंचाक्षरी मन्त्र--ऐं ह्रीं श्रीं ऐं ह्रीं ।

बीज मंत्र

ह्रींह्रांह्रूंह्रैंह्रौंह्रःहौंऐंश्रीं

साधना विधि

स्रोत के अनुसार विनियोग करके ऋष्यादिन्यास, कर-षडङ्ग न्यास, ध्यान और मानसोपचार पूजा करनी है। इसके बाद 'ह्रीं' मन्त्र का जप करना है। इसी प्रसंग में द्व्यक्षरी मन्त्र और पंचाक्षरी मन्त्र भी दिए गए हैं।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • भुवनेश्वरी उपासना
  • एकाक्षरी मन्त्र जप
  • द्व्यक्षरी मन्त्र जप
  • पंचाक्षरी मन्त्र जप
  • चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थ जप

लाभ

  • अभय
  • समस्त सिद्धियां
  • चतुर्वर्गसिद्धि

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

माता भुवनेश्वरी की उपासना (क) पूर्वाभास--माता भुवनेश्वरी शिव के समस्त लीला- विलास की सहचरी और निखिल-प्रपंचों की आदि कारण, सब की शक्ति और सभी का नाना प्रकार से पोषण करने वाली हैं। इनका स्वरूप सौम्य और अंगकान्ति अरुण है। भक्तों को अभय एवं समस्त सिद्धियां प्रदान करना आपका स्वाभाविक गुण है। पूर्वाम्नाय की तृतीया विद्या 'भुवनेश्वरी' है। इसकी उपासना तीन क्रम से होती है जिसमें १. एकाक्षरी भुवनेश्वरी, २. द्व्यक्षरी भुवनेशी और ३. पंचाक्षरी भुवनसुन्दरी का क्रम मन्त्राक्षरभेद से कथित है। भुवनेश्वरी को ही ललिता भी कहते हैं। भगवान् शिव ने 'ललिता' नाम से जगदम्बा के दो आम्नाय विभाजित किए हैं। एक पूर्वाम्नाय में तथा दूसरी ऊर्ध्वाम्नाय में। 'ललिता' शब्द 'सुन्दरी' शब्द का पर्याय है, इसलिए ललिता शब्द से जब 'त्रिपुरसुन्दरी' समझी जाती है तब वह 'श्रीविद्या ललिता' होती है और जब वही 'ललिता' पद से 'भुवनेश्वरी' की बोधक होती है तो वह 'भुवनेश्वरी ललिता' समझी जाती है। इनके भैरव सदाशिव हैं। भुवनेश्वरी का 'एकाक्षरी-मन्त्र विधान' इस प्रकार है-- (ख) एकाक्षरी मन्त्र विधान विनियोग--अस्य श्री भुवनेश्वरीमन्त्रस्य शक्तिर्ऋषिर्गायत्री- च्छन्दो भुवनेश्वरी देवता हकारो बीजम्, ईकारः शक्तिः, रेफः कीलकं चतुर्वर्गसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास--ऋषये नमः (शिरसि) । गायत्रीच्छन्दसे नमः (मुखे) । श्रीभुवनेश्वरी देवतायै नमः (हृदये) । हकारबीजाय नमः । (गुह्ये) । ईकारशक्तये नमः (पादयोः) । रेफकीलकाय नमः (नाभौ) । विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) । कर-षडङ्ग न्यास--ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, ह्रैं, ह्रौं, ह्रः। (इन छह बीजों से यह न्यास करें)। ध्यान बालरविद्युतिभिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥ तदनन्तर मानसोपचार पूजा करके 'ह्रीं' मन्त्र का जप करें । द्व्यक्षरीमन्त्र--हौं ॐ ह्रीं। पंचाक्षरी मन्त्र--ऐं ह्रीं श्रीं ऐं ह्रीं । श्रीभुवनेश्वरी का बीज मन्त्र ह्रीं देवीप्रणव के रूप में भी प्रसिद्ध है तथा भावभेद से अनेक मन्त्रों के साथ इसका स्मरण होता है। भुवनेश्वरी-यन्त्र का स्वरूप, मध्य में षट्कोण, उसके बाद अष्टदल पद्म, फिर षोडशदल कमल और चतुर्द्वारयुक्त भूपुर से युक्त होता है। रुद्रयामल में इनकी उपासना के लिए विस्तार से वर्णन हुआ है।

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