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छिन्नमस्ता षोडशाक्षरी मन्त्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ छिन्नमस्ता षोडशाक्षरी मंत्र और ध्यान -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताछिन्नमस्ता-भगवती / प्रचण्डचण्डिका

छिन्नमस्ता साधनामहाविद्या साधनातंत्र साधनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में छिन्नमस्ता-भगवती की आराधना के अंतर्गत स्वरूप-दर्शन, यन्त्र-मन्त्र परिचय, षोडशाक्षरी मन्त्र, ध्यान और मूलमन्त्र के बीजों से बने मन्त्रों के जप-फल का संकेत दिया गया है।

मूल मंत्र

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा

प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्त्रिकां,
दिग्वस्त्रां स्वकबन्धशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा।
नागाबद्धशिरोमणिं त्रिनयनां हृद्युत्पलालङ्कृतां,
रत्यासक्तमनोभवोपरि दृढां ध्यायेज्जवासन्निभाम् ॥

बीज मंत्र

श्रींह्रींक्लींऐंहूंफट्

साधना विधि

स्रोत के अनुसार चतुर्थ सन्ध्याकाल में शत्रुविजय, समूहस्तम्भन, राज्यप्राप्ति एवं मोक्षप्राप्ति हेतु छिन्नमस्ता देवी के मन्त्र का जप और पूजन का विधान है। वांछित कामनापूर्ति, अष्टसिद्धि और धन-धान्य-पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए मन्त्र-जप के साथ स्तोत्र-पाठ, कवच, हृदय, अष्टोत्तरशत और सहस्रनाम पाठ भी करने चाहिएं।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • छिन्नमस्ता देवी के मन्त्र का जप
  • पूजन
  • चतुर्थ सन्ध्याकाल साधना
  • शत्रुविजय
  • समूहस्तम्भन
  • राज्यप्राप्ति
  • मोक्षप्राप्ति
  • वशीकरण
  • पापनाश
  • मुक्तिलाभ
  • मन्त्र-जप के साथ स्तोत्र-पाठ
  • कवच
  • हृदय
  • अष्टोत्तरशत
  • सहस्रनाम पाठ

लाभ

  • शत्रुविजय
  • समूहस्तम्भन
  • राज्यप्राप्ति
  • मोक्षप्राप्ति
  • वशीकरण
  • पापनाश
  • मुक्तिलाभ
  • वांछित कामनापूर्ति
  • अष्टसिद्धि
  • धन-धान्य-पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

६. छिन्नमस्ता-भगवती की आराधना (क) स्वरूप-दर्शन एवं यन्त्र-मन्त्र परिचय--दस महाविद्याओं में छिन्नमस्ता का स्वरूप अन्य सभी से भिन्न है। अपनी प्रिय सहचरी जया और विजया की क्षुधाशान्ति के लिए दयावती माता ने स्वयं का सिर काटकर स्वशरीर से निकली हुई त्रिधारा से उन दोनों को तथा स्वयं को तृप्त किया। इसका अपर नाम 'प्रचण्डचण्डिका' भी है। इस देवी की आराधना दक्षिण, उत्तर और अधर आम्नायों से होती है। चतुर्थ सन्ध्याकाल में शत्रुविजय, समूहस्तम्भन, राज्यप्राप्ति एवं मोक्षप्राप्ति हेतु छिन्नमस्ता देवी के मन्त्र का जप और पूजन का विधान है। इस महाविद्या के भैरव 'विकराल' हैं। त्रिकोण, त्रिवृत्त, त्रिकोण, अष्टदल और भूपुररेखात्रय से छिन्नमस्ता का मन्त्र बनाया जाता है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा' यह षोडशाक्षरी मन्त्र और कुछ अन्य मन्त्र इनके प्राप्त होते हैं। इनका ध्यान इस प्रकार है-- प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्त्रिकां, दिग्वस्त्रां स्वकबन्धशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा। नागाबद्धशिरोमणिं त्रिनयनां हृद्युत्पलालङ्कृतां, रत्यासक्तमनोभवोपरि दृढां ध्यायेज्जवासन्निभाम् ॥ रुद्रयामल में उपर्युक्त मूलमन्त्र के बीजों को भिन्न-भिन्न क्रम से रखकर उनसे बने मन्त्रों के जप से वशीकरण, पापनाश, मुक्तिलाभ आदि फलों की प्राप्ति का संकेत दिया है। वांछित कामनापूर्ति, अष्ट- सिद्धि, धन-धान्य-पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए मन्त्र-जप के साथ स्तोत्र-पाठ, कवच, हृदय, अष्टोत्तरशत और सहस्रनाम पाठ भी करने चाहिएं। एक आठ पद्यों का स्तोत्र साधकों की सुविधा के लिए हम यहां दे रहे हैं--

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