विद्याराज्ञी बाईस अक्षरी मन्त्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ दक्षिणाकाली बाईस अक्षरी मंत्र -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ दक्षिणाकालिका
शक्ति उपासनाकाली साधनादक्षिणाकाली मंत्ररुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में दक्षिणाकालिका के सृष्टि, स्थिति और संहार क्रम से उपासित होने के प्रसंग में आगमों का बाईस अक्षरों वाला "विद्याराज्ञी" मन्त्र दिया गया है।
मूल मंत्र
क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।
बीज मंत्र
क्रींह्रींहूं
साधना विधि
स्रोत में दक्षिणाकालिका को सृष्टि, स्थिति और संहार क्रम से उपासित बताया गया है। पांच त्रिकोण, त्रिवृत्त, अष्टदल, वृत्त एवं भूपुर की रचना से काली-यन्त्र निर्माण का निर्देश दिया गया है और आगमों में यह विद्याराज्ञी मन्त्र प्रसिद्ध कहा गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- दक्षिणाकालिका उपासना
- सृष्टि-स्थिति-संहार क्रम
- विद्याराज्ञी मन्त्र
- काली-यन्त्र
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
यही भगवती मध्याह्न में श्यामाकाली और सायाह्न में सिद्धिकाली के रूप में अन्य मंत्रों द्वारा उपास्या है। दक्षिणाकालिका भी सृष्टि, स्थिति और संहार क्रम से उपासित होती है। पांच त्रिकोण, त्रिवृत्त, अष्टदल, वृत्त एवं भूपुर (एक रेखात्मक) की रचना से काली-यन्त्र का निर्माण होता है। आगमों में—“क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।” यह बाईस अक्षरों का ‘विद्याराज्ञी’ मन्त्र प्रसिद्ध है।
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