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इन्द्राक्षी दुर्गा मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ इन्द्राक्षी दुर्गा यन्त्र पूजा और मंत्र जप विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताइन्द्राक्षी-दुर्गा

दुर्गा साधनाइन्द्राक्षी दुर्गा मंत्रयन्त्र पूजारोग निवृत्ति मंत्ररुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में 'भगवती दुर्गा के अनन्तरूप' के अंतर्गत विभिन्न रोगों की निवृत्ति के लिए 'इन्द्राक्षी-दुर्गा' का मन्त्र-जप, कवच-पाठ, स्तोत्र-पाठ तथा यन्त्र-पूजा आदि का निर्देश रुद्रयामलोक्त 'इन्द्राक्षी पञ्चाङ्ग' में बताया गया है।

मूल मंत्र

इन्द्राक्षी-दुर्गा आराधना मन्त्र

इन्द्राक्षी-दुर्गा की आराधना करने के इच्छुक सर्वप्रथम गुरु और गणपति का स्मरण करके अपने समक्ष एक पट्ट पर, किसी पात्र में अथवा भोज-पत्र पर निम्नलिखित "इन्द्राक्षी-यन्त्र" अष्टगन्ध से दाडिम की लेखनी से बनायें। तदनन्तर यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजा करें और उसके बाद मन्त्र-जप करें। मन्त्र इस प्रकार है--

"ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं ऐं इन्द्राक्षि नमः।"

मन्त्रजप के आदि और अन्त में कवच का पाठ करना उत्तम माना गया है। इससे शरीर की रक्षा के साथ ही मन्त्र-जप में विघ्न डालने वाले क्षुद्र देवों का प्रभाव नहीं होता है।

बीज मंत्र

श्रींह्लींक्लींऐं

साधना विधि

स्रोत के अनुसार साधक को सर्वप्रथम गुरु और गणपति का स्मरण करना है। फिर अपने समक्ष पट्ट, पात्र अथवा भोज-पत्र पर इन्द्राक्षी-यन्त्र अष्टगन्ध से दाडिम की लेखनी से बनाकर यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजा करनी है। उसके बाद मन्त्र-जप करना है। मन्त्रजप के आदि और अन्त में कवच का पाठ उत्तम माना गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • इन्द्राक्षी-दुर्गा मन्त्र-जप
  • इन्द्राक्षी-यन्त्र पूजा
  • विभिन्न रोगों की निवृत्ति
  • कवच-पाठ के साथ मन्त्र-जप
  • षोडशोपचार पूजा

लाभ

  • भक्तों की रक्षा
  • आकांक्षाओं की पूर्ति
  • विभिन्न रोगों की निवृत्ति
  • शरीर की रक्षा
  • मन्त्र-जप में विघ्न डालने वाले क्षुद्र देवों के प्रभाव का निवारण

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

(ख) भगवती दुर्गा के अनन्तरूप हैं। माता दुर्गा ने अपने भक्तों की रक्षा एवं उनकी भिन्न-भिन्न भावनाओं के अनुसार आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अनेक रूपों में अवतार लिए हैं। विभिन्न रोगों की निवृत्ति के लिए 'इन्द्राक्षी-दुर्गा' का मन्त्र-जप, कवच-पाठ, स्तोत्रपाठ तथा यन्त्र-पूजा आदि का निर्देश रुद्रयामलोक्त 'इन्द्राक्षी पञ्चाङ्ग' में हुआ है। यहां हम कुछ पाठ प्रस्तुत कर रहे हैं। इन्द्राक्षी-दुर्गा की आराधना करने के इच्छुक सर्वप्रथम गुरु और गणपति का स्मरण करके अपने समक्ष एक पट्ट पर, किसी पात्र में अथवा भोज-पत्र पर निम्नलिखित 'इन्द्राक्षी-यन्त्र' अष्टगन्ध से दाडिम की लेखनी से बनायें। तदनन्तर यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजा करें और उसके बाद मन्त्र-जप करें। मन्त्र इस प्रकार है-- ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं ऐं इन्द्राक्षि नमः। यन्त्र का स्वरूप-- मन्त्रजप के आदि और अन्त में कवच का पाठ करना उत्तम माना गया है। इससे शरीर की रक्षा के साथ ही मन्त्र-जप में विघ्न डालने वाले क्षुद्र देवों का प्रभाव नहीं होता है।

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