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इन्द्राक्षी स्तोत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ इन्द्राक्षी स्तोत्र रोग ज्वर अपमृत्यु निवारण पाठ -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताइन्द्राक्षी दुर्गा

दुर्गा साधनाइन्द्राक्षी स्तोत्ररोग नाशक स्तोत्रज्वर निवारणरुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में 'इन्द्राक्षी-स्तोत्रम' शीर्षक के अंतर्गत यह स्तोत्र और उसके बाद पाठफल/विधि दी गई है।

मूल मंत्र

इन्द्राक्षी-स्तोत्रम

इन्द्राक्षी नाम सा देवी देवतैः समुदाहृता।
गौरी शाकम्भरी देवी दुर्गानाम्नीति विश्रुता॥१॥

कात्यायनी महादेवी चन्द्रघण्टा महातपाः।
सावित्री सा च गायत्री ब्राह्मणी ब्रह्मवादिनी॥२॥

नारायणी भद्रकाली रुद्राणी कृष्णपिङ्गला।
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्री तपस्विनी॥३॥

मेघस्वना सहस्राक्षी विकटाक्षी जलोदरी।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥४॥

अजिता भद्रदाऽऽनन्दा रोगहन्त्री शिवप्रिया।
शिवदूती कराली च प्रत्यक्षपरमेश्वरी॥५॥

इन्द्राणी इन्द्ररूपा च इन्द्रशक्तिः परायणा।
सदा सम्मोहिनी देवी सुन्दरी भुवनेश्वरी॥६॥

एकाक्षरी परा ब्राह्मी स्थूलसूक्ष्मप्रवर्तिनी।
नित्यं सकलकल्याणी भोगमोक्षप्रदायिनी॥७॥

महिषासुरसंहन्त्री चामुण्डा सप्तमातृका।
वाराही नारसिंही च भीमा भैरवनादिनी॥८॥

श्रुतिः स्मृतिर्धृतिर्मेधा विद्या लक्ष्मीः सरस्वती।
अनन्ता विजयापर्णा मानस्तोकापराजिता॥९॥

भद्राणी पार्वती दुर्गा हैमवत्यम्बिका शिवा।
शिवा भवानी रुद्राणी शंकरार्धशरीरिणी॥१०॥

ऐरावतगजारूढा वज्रहस्ता वरप्रदा।
भ्रामरी काञ्चिकामाक्षी क्वणन्माणिक्यनूपुरा॥११॥

त्रिपाद्भस्मप्रहरणा त्रिशिरा रक्तलोचना।
शिवा च शिवरूपा च शिवभक्तिपरायणा॥१२॥

मृत्युंजया महामाया सर्वरोगनिवारिणी।
ऐन्द्री देवी सदा कालं शान्तिमाशु करोतु मे॥१३॥

भस्मायुधाय विद्महे, रक्तनेत्राय धीमहि, तन्नो
ज्वरहरः प्रचोदयात्।

एतत् स्तोत्रं जपेन्नित्यं सर्वव्याधिनिवारणम्।
रणे राजभये शौर्ये सर्वत्र विजयी भवेत्॥१४॥

एतैर्नामपदैर्दिव्यैः स्तुता शक्रेण धीमता।
सा मे प्रीत्या सुखं दद्यात् सर्वापत्तिनिवारिणी॥१५॥

ज्वरं भूतज्वरं चैव शीतोष्णज्वरमेव च।
ज्वरं ज्वरातिसारं च अतिसारज्वर हर॥१६॥

शतमावर्तयेद् यस्तु मुच्यते व्याधिबन्धनात्।
आवर्तयन् सहस्रं तु लभते वाञ्छितं फलम्॥१७॥

एतत्स्तोत्रमिदं पुण्यं जपेदायुष्यवर्धनम्।
विनाशाय च रोगाणामपमृत्युहराय च॥१८॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥

साधना विधि

इस स्तोत्र का स्वयं इन्द्र ने अपने संकट का निवारण करने के लिए पाठ किया था। इसकी १०० अथवा एक हजार आवृत्ति करने से इच्छित फल की प्राप्ति, आयुष्य की वृद्धि, रोगों का नाश तथा अपमृत्यु दूर होती है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • इन्द्राक्षी स्तोत्र पाठ
  • सर्वव्याधि निवारण
  • रण राजभय शौर्य में विजय
  • ज्वर भूतज्वर शीतोष्णज्वर अतिसारज्वर निवारण
  • आयुष्य वृद्धि
  • अपमृत्यु निवारण

लाभ

  • सर्वव्याधि निवारण
  • रण राजभय शौर्य में विजय
  • ज्वर भूतज्वर शीतोष्णज्वर अतिसारज्वर निवारण
  • इच्छित फल की प्राप्ति
  • आयुष्य की वृद्धि
  • रोगों का नाश
  • अपमृत्यु निवारण

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

इन्द्राक्षी-स्तोत्रम इन्द्राक्षी नाम सा देवी देवतैः समुदाहृता। गौरी शाकम्भरी देवी दुर्गानाम्नीति विश्रुता॥१॥ कात्यायनी महादेवी चन्द्रघण्टा महातपाः। सावित्री सा च गायत्री ब्राह्मणी ब्रह्मवादिनी॥२॥ नारायणी भद्रकाली रुद्राणी कृष्णपिङ्गला। अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्री तपस्विनी॥३॥ मेघस्वना सहस्राक्षी विकटाक्षी जलोदरी। महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥४॥ अजिता भद्रदाऽऽनन्दा रोगहन्त्री शिवप्रिया। शिवदूती कराली च प्रत्यक्षपरमेश्वरी॥५॥ इन्द्राणी इन्द्ररूपा च इन्द्रशक्तिः परायणा। सदा सम्मोहिनी देवी सुन्दरी भुवनेश्वरी॥६॥ एकाक्षरी परा ब्राह्मी स्थूलसूक्ष्मप्रवर्तिनी। नित्यं सकलकल्याणी भोगमोक्षप्रदायिनी॥७॥ महिषासुरसंहन्त्री चामुण्डा सप्तमातृका। वाराही नारसिंही च भीमा भैरवनादिनी॥८॥ श्रुतिः स्मृतिर्धृतिर्मेधा विद्या लक्ष्मीः सरस्वती। अनन्ता विजयापर्णा मानस्तोकापराजिता॥९॥ भद्राणी पार्वती दुर्गा हैमवत्यम्बिका शिवा। शिवा भवानी रुद्राणी शंकरार्धशरीरिणी॥१०॥ ऐरावतगजारूढा वज्रहस्ता वरप्रदा। भ्रामरी काञ्चिकामाक्षी क्वणन्माणिक्यनूपुरा॥११॥ त्रिपाद्भस्मप्रहरणा त्रिशिरा रक्तलोचना। शिवा च शिवरूपा च शिवभक्तिपरायणा॥१२॥ मृत्युंजया महामाया सर्वरोगनिवारिणी। ऐन्द्री देवी सदा कालं शान्तिमाशु करोतु मे॥१३॥ भस्मायुधाय विद्महे, रक्तनेत्राय धीमहि, तन्नो ज्वरहरः प्रचोदयात्। एतत् स्तोत्रं जपेन्नित्यं सर्वव्याधिनिवारणम्। रणे राजभये शौर्ये सर्वत्र विजयी भवेत्॥१४॥ एतैर्नामपदैर्दिव्यैः स्तुता शक्रेण धीमता। सा मे प्रीत्या सुखं दद्यात् सर्वापत्तिनिवारिणी॥१५॥ ज्वरं भूतज्वरं चैव शीतोष्णज्वरमेव च। ज्वरं ज्वरातिसारं च अतिसारज्वर हर॥१६॥ शतमावर्तयेद् यस्तु मुच्यते व्याधिबन्धनात्। आवर्तयन् सहस्रं तु लभते वाञ्छितं फलम्॥१७॥ एतत्स्तोत्रमिदं पुण्यं जपेदायुष्यवर्धनम्। विनाशाय च रोगाणामपमृत्युहराय च॥१८॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥ इस स्तोत्र का स्वयं इन्द्र ने अपने संकट का निवारण करने के लिए पाठ किया था। इसकी १०० अथवा एक हजार आवृत्ति करने से इच्छित फल की प्राप्ति, आयुष्य की वृद्धि, रोगों का नाश तथा अप- मृत्यु दूर होती है।

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