काली कवच-पाठरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ काली कवच पाठ आत्मरक्षा और शत्रु नाश -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ श्री कालिका
शक्ति उपासनाकाली साधनाकवच पाठरुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में भगवती आद्याकाली का यह काली-कवच पाठ स्वरक्षा, शत्रुनाश, ऐश्वर्य-प्राप्ति और सर्वसिद्धि के प्रसंग में दिया गया है।
मूल मंत्र
श्रीकाली-कवचम् श्री गणेशाय नमः॥ कैलाशशिखरासीनं शङ्करं वरदं शिवम्। देवी पप्रच्छ सर्वज्ञं देवदेवं महेश्वरम्॥१॥ देव्युवाच॥ भगवन् देवदेवेश देवानां मोक्षद प्रभो। प्रब्रूहि मे महाभाग गोप्यं यद्यपि च प्रभो॥२॥ शत्रूणां येन नाशः स्यादात्मनो रक्षणं भवेत्। परमैश्वर्यमतुलं लभेद् येन हि तं वद॥३॥ भैरव उवाच॥ वक्ष्यामि ते महादेवि सर्वधर्महिताय च। अद्भुतं कवचं देव्या सर्वरक्षाकरं नृणाम्॥४॥ सर्वारिष्ट-प्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम्। सुखदं भोगदं चैव वश्याकर्षणमद्भुतम्॥५॥ शत्रूणां संक्षयकरं सर्वव्याधिनिवारणम्। दुःखिनो ज्वरिणश्चैव स्वाभीष्टप्रदं तथा॥६॥ भोगमोक्षप्रदं चैव कालिकाकवचं पठेत्। विनियोग—अस्य श्रीकालीकवचस्य श्रीभैरवऋषिर्गायत्रीच्छन्दः श्रीकालिका देवता ममाभीष्टसिद्धये पाठे विनियोगः। क्रां, क्रीं, क्रूं, क्रैं, क्रौं, क्रः इन छह बीजों से कर और हृदयादि न्यास करें और उसके पश्चात् ध्यान करें। ध्यायेत् कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम्। चतुर्भुजां ललज्जिह्वां पूर्णचंद्रनिभाननाम्॥७॥ नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसंघविदारिणीम्॥८॥ नरमुण्डं तथा खड्गं कमलं च वरं तथा। बिभ्राणां रक्तवसनां दंष्ट्राढ्यां घोररूपिणीम्॥९॥ अट्टाट्टहास-निरतां सर्वदा च दिगम्बराम्। शवासनस्थितां देवीं मुण्डमाला-विभूषिताम्॥१०॥ मूल कवच-पाठः इति ध्यात्वा महादेवीं पुनस्तु कवचं पठेत्। ॐ कालिका घोररूपाद्या सर्वकामप्रदा शुभा॥११॥ सर्वदेव-स्तुतां देवी शत्रुनाशं करोतु मे। ह्रीं ह्रीं स्वरूपिणीं चैव ह्रीं ह्रीं हूं रूपिणीं तथा॥१२॥ ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वरूपा सा सदा शत्रुविदारयेत्। श्रीं ह्रीं ऐं रूपिणी देवी भवबन्धविमोचिनी॥१३॥ हसकल ह्रीं ह्रीं रिपून् सा हरतु देवी सर्वदा। यथा शुम्भो हतो दैत्यो निशुम्भश्च महासुरः॥१४॥ वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शंकरप्रियाम्। ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका॥१५॥ कौमारी च चामुण्डा खादयन्तु मम द्विषः। सुरेश्वरी घोररूपा चण्ड-मुण्ड-विनाशिनी॥१६॥ मुण्डमालावृतांगी च सर्वतः पातु माम् सदा। ह्रीं ह्रीं कालिके घोरदंष्ट्रे रुधिरप्रिये रुधिरपूर्ण-वक्त्रे रुधिरावृत्तस्तनि मम शत्रून् खादय खादय हिसय हिसय मारय मारय भिन्दि भिन्दि छिन्धि छिन्धि उच्चाटय उच्चाटय द्रावय द्रावय शोषय शोषय स्वाहा स्वाहा। ह्रीं ह्रीं कालिकायै मदीय शत्रून् समर्पयामि स्वाहा। ॐ जय जय किरि किरि किटि किटि कुट कुट कट्ट कट्ट मर्दय मर्दय मोहय मोहय हर हर मम रिपून् ध्वंसय ध्वंसय भक्षय भक्षय त्रोटय त्रोटय यातुधानि चामुण्डे सर्वं जनान् राज्ञो राजपुरुषान् योषा रिपून् मम वश्यान् कुरु कुरु तन् तनु धान्यं धनमश्वान् गजान् रत्नानि दिव्यकामिनीः पुत्र-पौत्रान् राजश्रियं देहि देहि भक्ष भक्ष क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः स्वाहा। फलश्रुति इत्येतत्कवचं दिव्यं कथितं शम्भुना पुरा॥१७॥ ये पठन्ति सदा तेषां ध्रुवं नश्यन्ति शत्रवः। प्रलयः सर्व-व्याधीनां भवतीह न संशयः॥१८॥ धनहीनाः पुत्रहीनाः शत्रवस्तस्य सर्वदा। सहस्र-पाठनात्सिद्धिः कवचस्य भवेत्तथा॥१९॥ ततः कार्याणि सिद्ध्यन्ति यथा शङ्कर भाषितम्। श्मशानाङ्गारमादाय चूर्णीकृत्य प्रयत्नतः॥२०॥ पादोदकेन स्पृष्ट्वा च लिखेल्लौह-शलाकया। भूमौ शत्रून् हीनरूपान् उत्तराशिरसस्तथा॥२१॥ हस्तं दत्त्वा तद् हृदये कवचं तु स्वयं पठेत्। शत्रोः प्राणप्रतिष्ठां तु कुर्यान्मंत्रेण मंत्रवित्॥२२॥ हन्यादस्त्र-प्रहारेण शत्रुर्गच्छेद् यमालयम्। ज्वलदंगार-तापेन भवन्ति ज्वरिणोऽरयः॥२३॥ प्रोक्षणैर्वामपादेन दरिद्रो भवति ध्रुवम्। वैरिनाशकरं प्रोक्तं कवचं वश्यकारकम्॥२४॥ परमैश्वर्यदं चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धिदम्। प्रभात-समये चैव पूजाकाले प्रयत्नतः॥२५॥ सायंकाले तथा पाठात् सर्वसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्। शत्रुरुच्चाटनं याति देशाच्च विच्युतो भवेत्॥२६॥ पश्चात्किंकरमाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः। शत्रुनाशकर देवि सर्व-सम्पत्प्रदे शुभे॥२७॥ सर्वदेवस्तुते देवि कालिके त्वां नमाम्यहम्।
बीज मंत्र
क्रांक्रींक्रूंक्रैंक्रौंक्रःह्रींहूंश्रींऐंक्षांक्षींक्षूंक्षैंक्षौंक्षः
साधना विधि
स्रोत में पाठ से पूर्व विनियोग और छह बीजों से कर तथा हृदयादि न्यास कर ध्यान करने का निर्देश है। कवच-पाठ एवं लिखित-रूप धारण से स्वरक्षा और शत्रुनाश की सिद्धि कही गयी है। स्रोत में बिना गुरु-परम्परा से दीक्षा प्राप्त किए कालिका की उपासना में प्रवृत्त होना उचित नहीं बताया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- काली-कवच पाठ
- लिखित-रूप धारण
- स्वरक्षा
- शत्रुनाश
- विनियोग
- न्यास-ध्यान
लाभ
- स्वरक्षा
- शत्रुनाश
- सर्वारिष्ट-प्रशमन
- सर्वोपद्रव-नाश
- सर्वव्याधि-निवारण
- वश्याकर्षण
- भोग-मोक्ष
- परमैश्वर्य-प्राप्ति
- पुत्रपौत्रादि-वृद्धि
- सर्वसिद्धि
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
मंत्र-साधना में बतलाये गये पांच अंगों में कवच का महत्त्व है जिसका परिचय-विभाग में निर्देश हुआ है। यहां भगवती आद्याकाली का एक महत्त्वपूर्ण कवच-पाठ हम दे रहे हैं। इसके पाठ एवं लिखित-रूप के धारण से स्वरक्षा और शत्रुनाश की सिद्धि होती है। श्रीकाली-कवचम् ... सर्वदेवस्तुते देवि कालिके त्वां नमाम्यहम्। भगवती कालिका आद्यदेवी है। आद्या की उपासना का विस्तार तन्त्रों में बहुत अधिक है तथा स्वतन्त्र-ग्रन्थ भी अनेक प्राप्त होते हैं। रुद्रयामल में 'पंचांग' और कुछ अन्य नाम-भेद से भी साधना-साहित्य प्रस्तुत हुआ है। साधकगणों की सुविधा के लिए 'दक्षिणाचार' तथा वामाचार --दोनों ही प्रकारों के इसमें विधान दिए हैं; किन्तु बिना गुरु-परम्परा से दीक्षा प्राप्त किए कालिका की उपासना में प्रवृत्त होना उचित नहीं है, यह सदा स्मरणीय।
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