पंचाक्षरी तारा मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ तारा एकजटा पंचाक्षरी मंत्र और जप विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ श्रीएकजटा
तारा उपासनाशक्ति साधनाएकजटा मंत्ररुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में भगवती तारा की आगमिक आराधना के अंतर्गत एकजटा-मंत्र जपविधि दी गयी है।
मूल मंत्र
(क) एकजटा-मंत्र जपविधि १. विनियोग—अस्य श्रीएकजटामन्त्रस्य वशिष्ठ ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः श्रीएकजटा देवता हूं बीजं ह्रीं शक्तिः स्त्रीं कीलकं मम श्रीएकजटा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। २. ऋष्यादिन्यास—वशिष्ठऋषये नमः (शिरसि), गायत्रीच्छन्दसे नमः (मुखे), श्रीएकजटादेवतायै नमः (हृदये), हूं बीजाय नमः (गुह्ये), ह्रीं शक्तये नमः (पादयोः), स्त्रीं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। ३-४. कर-हृदयादिन्यासः—हां, हीं, हूं, हैं, हों, हः। (इन छः बीजों से पूर्ववत् न्यास करें।) ५. ध्यान— श्वेताम्बरां शारदचन्द्रकान्तिं सद्भूषणां चन्द्रकलावतंसाम्। कर्त्रीं कपालांचितपाणिपद्मां, तारां त्रिनेत्रां प्रभजेऽखिलर्द्ध्यै॥ ६. मंत्र—स्त्रीं हूं ह्रीं हूं फट्। (पंचाक्षरी) उग्रतारा ध्यान— प्रत्यालीढपदार्पिताङ्घ्रिशवहृद् घोराट्टहासा परा, खड्गेन्दीवरकर्त्रीखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा। खर्वा नीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता, जाड्यं न्यस्य कपालकं त्रिजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम्॥
बीज मंत्र
स्त्रींहूंह्रींफट्हांहींहैंहोंहः
साधना विधि
स्रोत में एकजटा मंत्र-जप से पहले विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादिन्यास और ध्यान का क्रम दिया गया है। कर-हृदयादिन्यास में छह बीजों से पूर्ववत् न्यास करने का निर्देश है। आगे उग्रतारा ध्यान और तारा-यन्त्र के लिए त्रिकोण, अष्टदल-पद्म एवं द्विरेखमय भूपुर का विधान बताया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- एकजटा मंत्र जप
- तारा उपासना
- विनियोग
- ऋष्यादिन्यास
- कर-हृदयादि न्यास
- ध्यान
लाभ
- वाक्शक्ति
- शत्रुनाश
- भोग-मोक्ष सिद्धि
- श्रीएकजटा प्रसादसिद्धि
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
वाक्शक्ति, शत्रुनाश एवं भोग-मोक्ष की सिद्धि के लिए भगवती तारा की उपासना होती है। यह क्रम की दृष्टि से द्वितीया होते हुए भी अद्वितीया है और एकजटा, उग्रतारा, नीलसरस्वती, तारिणी, क्रोधराविरूपा आदि अनेक नामों से आगमों में इसके मन्त्र-प्रयोग प्राप्त होते हैं। भारत में सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने वैदिक और चीनाचार क्रम से तारा की उपासना की थी। 'तारामोंकारसारां सकलजनहितानन्दसन्दोहदक्षाम्' इत्यादि वचनों के आधार पर यह सूर्यमण्डल-मध्यस्थिता तारा शब्द ब्रह्मस्वरूपा ओंकारनादमयी है। आगमिक आराधना के लिए तारा का मंत्र-जप-विधान इस प्रकार है। (क) एकजटा-मंत्र जपविधि १. विनियोग—अस्य श्रीएकजटामन्त्रस्य वशिष्ठ ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः श्रीएकजटा देवता हूं बीजं ह्रीं शक्तिः स्त्रीं कीलकं मम श्रीएकजटा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। २. ऋष्यादिन्यास—वशिष्ठऋषये नमः (शिरसि), गायत्रीच्छन्दसे नमः (मुखे), श्रीएकजटादेवतायै नमः (हृदये), हूं बीजाय नमः (गुह्ये), ह्रीं शक्तये नमः (पादयोः), स्त्रीं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। ३-४. कर-हृदयादिन्यासः—हां, हीं, हूं, हैं, हों, हः। (इन छः बीजों से पूर्ववत् न्यास करें।) ५. ध्यान— श्वेताम्बरां शारदचन्द्रकान्तिं सद्भूषणां चन्द्रकलावतंसाम्। कर्त्रीं कपालांचितपाणिपद्मां, तारां त्रिनेत्रां प्रभजेऽखिलर्द्ध्यै॥ ६. मंत्र—स्त्रीं हूं ह्रीं हूं फट्। (पंचाक्षरी) सृष्टि महोग्रतारा, स्थितिमहोग्रतारा और संहारमहोग्रतारा आदि नामान्तर होने से ध्यान मंत्र के स्वरूपों में अन्तर आ जाएगा। उग्रतारा की उपासना का सर्वत्र विस्तार से विधान प्राप्त होता है। उसका ध्यान इस प्रकार है। प्रत्यालीढपदार्पिताङ्घ्रिशवहृद् घोराट्टहासा परा, खड्गेन्दीवरकर्त्रीखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा। खर्वा नीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता, जाड्यं न्यस्य कपालकं त्रिजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम्॥ त्रिकोण, अष्टदल-पद्म एवं द्विरेखमय भूपुर के द्वारा तारा-यन्त्र बनाने का विधान है।
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