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तर्पण-विधान / तर्पण-प्रयोगरुद्रयामल तंत्रसंस्कृत + हिन्दी

महागणपति तर्पण मंत्र विधि और अन्य तर्पण प्रयोग रुद्रयामल तंत्र से

श्रीदेवतामहागणपति

महागणपति-साधना और रुद्रयामलगणपति-तर्पण विधानतर्पण के अन्य प्रयोग

तंत्र संदर्भ

रुद्रयामल में महागणपति-तर्पण के सम्बन्ध में मूलमन्त्र से सन्दर्भित 'चतुरावृत्ति-तर्पण' पर विशेष बल दिया है। 'योगिनीहृदय' की 'सेतुटीका' में रुद्रयामल का उदाहरण देते हुए लिखा है कि--

मूल मंत्र

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य ततो लक्ष्मीं समुच्चरेत्।
ततो गणेशबीजञ्च सिद्ध्या च सहितं ततः ॥ इत्यादि।

१. सामान्य क्रम
मूलमन्त्र ४, महागणपति तर्पयामि स्वाहा ४, पुष्टि ४, मू० ४, श्रीं लक्ष्मीनारायणौ त० ४, हीं गौरीहरौ त० ४, मू० ४, क्लीं रतिकन्दर्पौ त० ४, मू० ४, ग्लौं महीवराहौ त० ४, मू० ४, गं लक्ष्मीगणनायकौ त० ४, मू० ४, गं आमोदसिद्धी त० ४, मू० ४, गं प्रमोदसमृद्धी त० ४, मू० ४, गं सुमुखकान्ती त० ४, मू० ४, गं दुर्मुखमदनावत्यौ त० ४, मू० ४, गं विघ्नमदद्रवे त० ४, मू० ४, गं विघ्नकर्तृ द्राविण्यौ त० ४, मू० ४, शं शंखनिधिवसुधारे त० ४, मू० ४, पं पद्मनिधिवसुमत्यौ तर्पयामि स्वाहा। इस प्रकार यह तर्पण १२४ बार होता है।

२. मध्यमक्रम--
मूलमन्त्र ४, श्रीं नारायणसहितां लक्ष्मीं तर्पयामि स्वाहा ४, मू० ४, श्रीं लक्ष्मीसहितं नारायणं तर्पयामि स्वाहा ४, मू० ४, हीं हरसहितां गौरी त० ४, मू० ४, हीं गौरीसहितं हरं त० ४, मू० ४, क्लीं कामसहितां रति त० ४, मू० ४, हीं रतिसहितं कामं त० ४, मू० ४, ग्लौं वराहसहितां महीं त० ४, मू० ४, ग्लौं महीसहितं वराहं त० ४, मू० ४, गं महागणपतिसहितां लक्ष्मीं त० ४, मू० ४, गं लक्ष्मीसहितं महागणपति त० ४, मू० ४, गं आमोदसहितां सिद्धि त० ४, गं सिद्धिसहितं आमोदं त० ४, मू० ४, गं प्रमोदसहितां समृद्धि त० ४, मू० ४, गं समृद्धिसहितं प्रमोदं त० ४, मू० ४, गं सुमुखसहितां कान्ति त० ४, मू० ४, गं कान्तिसहितं सुमुखं त० ४, मू० ४, गं दुर्मुखसहितां मदनावतीं त० ४, मू० ४, गं मदनावतीं सहितं दुर्मुखं त० ४, मू० ४, गं विघ्नसहितां मदद्रवां त० ४, मू० ४, गं मदद्रवासहितं विघ्नं त० ४, मू० ४, गं विघ्नकर्तृ सहितां द्राविणी त० ४, मू० ४, गं द्राविणीसहितं विघ्नकर्तारं त० ४, मू० ४, शं शंखनिधिसहितां वसुधारां त० ४, मू० ४, शं वसुधारासहितं शंखनिधि त० ४, मू० ४, पं पद्मनिधिसहितां वसुमतीं त० ४, मू० ४, पं वसुमतीसहितं पद्मनिधि त० ४, मू० ४, पुनः मूलमन्त्र से ४। इस प्रकार यह तर्पण २१६ बार होता है।

३. उत्तमक्रम--
मूलमन्त्र ४, ॐ तर्पयामि स्वाहा ४, मू० ४, श्रीं ४, मू० ४, हीं ४, मू० ४, क्लीं ४, ग्लौं ४, मू० ४, गं० ४, मू० ४, गं ४, मू० ४, णं ४, मू० ४, पं० ४, मू० ४, तं० ४, मू० ४, वं ४, मू० ४, वें ४, मू० ४, रं ४, मू० ४, वं ४, मू० ४, रं ४, मू० ४, दं ४, मू० ४, सें ४, मू० ४, वें ४, मू० ४, जं ४, मू० ४, नं ४, मू०, में ४, मू० ४, वं ४, मू० ४, शं ४, मू० ४, मां ४, मू० ४, नं ४, मू० ४, यं ४, मू० ४, स्वां ४, मू० ४, हां ४, मू० ४। पुनः मूलमन्त्र ४।

इस प्रकार ये सभी मिलकर २२८ बार तर्पण करके मध्यम प्रकार के २१६ बार का तर्पण करे जिससे ४४४ बार तर्पण होता है।

६. तर्पण के अन्य प्रयोग--
शुण्डाकराग्रे गणपं जलेन प्रतर्पयेन्मुक्तिफलाय मन्त्री।
तथेन्दिराकामनयां गणेशं प्रतर्पयेन्मूर्ध्नि पयोभिरत्र ॥१॥
गुह्यप्रदेशे मधुना गणेशं प्रतर्पयेत् कामफलाय विद्वान्।
आकृष्टिवश्यादिनिमित्तमत्र प्रतर्पयेत् तं मधुभिश्च नेत्रे ॥२॥
भूपालवश्याय महागणेशं प्रतर्पयेच्चारु घृतेन पृष्ठे।
ऊरुस्थले तैलयुततर्पणं च महागणेशप्रियमेतदुक्तम् ॥३॥
एरण्डतेलेन तथाऽस्य रण्डावश्याय नाभौ किल तर्पणं स्यात्।
स्कन्धप्रदेशेऽस्य पयः पयोभिः प्रतर्पणं प्रीतिविवर्धनाय ॥४॥
क्षीरेण दध्ना मधुनाऽस्य तुन्दे प्रतर्पणं पुत्रविवृद्धिकृत्स्यात्।
एवं परिज्ञाय समस्तमेतत् कुर्यात् योगान् विधिना मनोज्ञः ॥५॥

बीज मंत्र

श्रींहींक्लींग्लौंगंशंपं

अर्थ एवं भावार्थ

अर्थात् मुक्ति के लिए सूंड पर जल से, लक्ष्मी के लिए मस्तक पर दूध से, काम-फल के लिये गुह्य पर मधु से, आकर्षण और वश्य के लिए नेत्रों पर मधु से, राजवश्य के लिए पीठ पर घृत से, गणेश की प्रसन्नता के लिए ऊरू युगल पर तेल से, स्त्रीवशीकरण के लिए नाभि पर एरण्ड के तेल से तथा पुत्र-वृद्धि के लिए उदर पर दूध, दही तथा मधु से तर्पण करना चाहिए।

साधना विधि

यह तर्पण-प्रयोग यद्यपि दीक्षित साधक के द्वारा ही करणीय है तथापि जिसने 'महागणपति-मन्त्र' प्राप्त किया है वह इससे नित्य, नैमित्तिक और काम्य-प्रयोग करे तो उसे संकटों से मुक्ति और इच्छित-फलों की प्राप्ति अवश्य होती है। अतः इसका मूल-प्रयोग यहां दिया जा रहा है--

तर्पण-विधान--

इस प्रयोग में तर्पण-कर्ता सर्वप्रथम एक तांबे के अथवा पीतल के पात्र में शुद्ध जल भर ले और अन्य थाली में गणपति-मन्त्र अथवा गणपति-मूर्ति को स्थापित कर हाथों से अथवा अर्घ्यपात्र से एक-एक मंत्र बोलता जाए और अर्घ्यजल सामने चढ़ाये। अर्घ्यजल को सुगन्धित केसरादि से सुवासित करे, अभिमन्त्रित करे और उसमें दूर्वा, अक्षत आदि भी छोड़े। इस तर्पण में १२४ का सामान्य क्रम २१६ का मध्यम और ४४४ का उत्तम क्रम कहा गया है। संक्षेप में इसकी पद्धति इस प्रकार है--

प्रयोग — कब और कहाँ

  • नित्य-प्रयोग
  • नैमित्तिक प्रयोग
  • काम्य-प्रयोग
  • महागणपति-तर्पण-प्रयोग
  • तर्पण के अन्य प्रयोग

लाभ

  • संकटों से मुक्ति
  • इच्छित-फलों की प्राप्ति
  • भिन्न-भिन्न कामनाओं की सिद्धि
  • सद्यः कामना-सिद्धि