ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
महामृत्युंजय साधना संकेतरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

महामृत्युंजय साधना मुख्य संकेत और रुद्राणी रुद्र ध्यान -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतामहामृत्युंजय भगवान् महादेव / रुद्र-रुद्राणी

शिव साधनामहामृत्युंजय साधनारुद्राणी साधनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

रुद्रयामल (उत्तरतंत्र) के ४७वें पटल में चक्रभेदन के प्रसंग में भगवती आनन्दभैरवी द्वारा मणिपूर-भेदन, रुद्राणी सहित रुद्र ध्यान-पूजन और महामृत्युंजय उपासना के संकेत दिये गये हैं।

मूल मंत्र

जिस प्रकार तन्त्रशास्त्रों में अन्यान्य देवताओं की उपासना के प्रकारों का विधिवत् विधान बतलाया है, उसी प्रकार भगवान् शिव के भी अनेक प्रकार दिखलाकर उन्हें प्रसन्न करने के विधान भी बतलाये हैं। रुद्रयामल में वर्णित 'अघोर-शिव, त्वरितरुद्र, महाकाल, शिव, सदाशिव, महामृत्युंजय आदि के प्रयोग विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें से हम स्वोपयोगी महामृत्युंजय की उपासना हेतु मन्त्रादि का निर्देश कर रहे हैं।

१. महामृत्युञ्जय-साधना के मुख्य संकेत

मानव की सबसे बड़ी चिन्ता शरीर की स्वस्थता, मानसिक प्रसन्नता, दीर्घजीवन और मृत्यु से रक्षा की होती है। जीवन में उत्साह तथा उल्लास का संचार इन्हीं पर निर्भर है। यदि ये सब नहीं तो सभी प्रकार की उधेड़-बुन किसलिए? किसके लिए? इस चिन्ता का निवारण करने का सरलतम उपाय है—महामृत्युंजय भगवान् महादेव की भक्ति। यही वह साधना है कि जिसे पाकर मनुष्य आगे बढ़ता है, आशाओं के दीप जलाता है और उनके उज्ज्वल प्रकाश में अपने विचारों, प्रयासों एवं आकांक्षाओं को मूर्तिमान् बनाकर सफल होता है।

रुद्रयामल (उत्तरतंत्र) के ४७वें पटल में चक्रभेदन के प्रसंग में भगवती आनन्दभैरवी ने मणिपूर-भेदन का वर्णन करते हुए कहा है कि—अष्टैश्वर्य साधक, जीवन्मुक्तिदाता एवं सर्वज्ञता प्रदान करने वाले मणिपूर-भेदक मन्त्र का मैं कथन करती हूं। साधक मणिपूर में रुद्राणी सहित रुद्र का ध्यान एवं पूजन करके 'ॐ नमस्ते रुद्ररूपिण्ये' इस रुद्राणी मन्त्र का तथा 'ॐ नमस्ते रुद्राय' इस महारुद्र मन्त्र का जप करे। षट्चक्रसाधन में ही अन्य मन्त्रों का कथन करते हुए कहा गया है कि—भगवान् महारुद्र के अनंत मन्त्र हैं। उनमें मृत्युंजय मन्त्र द्वारा मणिपूर में स्थित रुद्राणी और रुद्र को चैतन्य करना चाहिए।

उसके लिए प्रधान मन्त्र 'ॐ हौं स्वाहा', 'ॐ हौं जूं स्वाहा' अथवा मृत्युंजय-महामन्त्र का मानस जप करना चाहिए और इसके पश्चात् पूजा विधान, न्यास-विधान तथा अन्य प्रक्रियाओं का विस्तार से निर्देश है। इनमें रुद्राणी का तथा रुद्र का ध्यान इस प्रकार है—

१. रुद्राणीं रुद्रकान्तां नवरसजडितां कुङ्कुमासक्तगात्रां,
लोकेशीं षड्भुजान्तां त्रिभुवनमहितां कोटिसौदामिनीभाम्।
पद्मस्थां पद्महस्तां वरमभयकरां खड्गशक्तिं दधानां,
ध्यायेद् रौद्रीं त्रिनेत्रां शरदमलशशिश्रेणिभूषामलाङ्गीम्॥

तथा

२. रौद्रं रुद्रात्मकं तं प्रकृति-पुरुष-गम्भीरगीताभिधानं,
शूलं खड्गं दधानं वरमभयकरं पद्ममेकं प्रचण्डम्।
सञ्चारं रश्मिजालं शशिशतकिरणं कामधेनुस्वरूपं,
ध्यायेद् रौद्रं स्वशक्तिं प्रलयमयतनुं सूर्यकोटिप्रकाशम्॥

रुद्रयामल में रुद्र के समान ही रुद्रशक्ति का पूजन-स्मरण भी आवश्यक बतलाया है। रुद्रयामल के अनुसार यह बहुत ही रहस्यपूर्ण कथन है कि मणिपूर में इस मन्त्र का जप होना चाहिए, क्योंकि इसी चक्र में अमृत का निवास है और अमृत ही मृत्यु को जीतने का सर्वोत्तम साधन है। इसी दृष्टि से यहां 'मणिपूर भेदनस्तोत्र' भी दिया गया है, जिसका पाठ करने से पूर्णलाभ होता है। यहीं यह भी कहा गया है कि—

मृत्युञ्जयस्य मन्त्रं वै जपते यदि मानवः।
कोटिवर्षशतं स्थित्वा, लीनो भवति ब्रह्मणि॥४७/२४०॥

इसी दृष्टि से हम महामृत्युंजय-मन्त्र के विभिन्न स्वरूपों का यहां संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। विस्तार से जानने के इच्छुक हमारी पुस्तक—"महामृत्युंजय साधना और सिद्धि" देखें।

बीज मंत्र

हौंजूं

साधना विधि

साधक मणिपूर में रुद्राणी सहित रुद्र का ध्यान एवं पूजन करके 'ॐ नमस्ते रुद्ररूपिण्ये' रुद्राणी मन्त्र और 'ॐ नमस्ते रुद्राय' महारुद्र मन्त्र का जप करे। उसके लिए प्रधान मन्त्र 'ॐ हौं स्वाहा', 'ॐ हौं जूं स्वाहा' अथवा मृत्युंजय-महामन्त्र का मानस जप करना बताया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • महामृत्युंजय उपासना
  • रुद्राणी मन्त्र जप
  • महारुद्र मन्त्र जप
  • मणिपूर भेदन
  • रुद्राणी रुद्र ध्यान
  • मृत्यु से रक्षा

लाभ

  • शरीर की स्वस्थता
  • मानसिक प्रसन्नता
  • दीर्घजीवन
  • मृत्यु से रक्षा
  • अष्टैश्वर्य साधन
  • जीवन्मुक्तिदाता
  • सर्वज्ञता प्रदान