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मृतसंजीवनी विद्या मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

मृतसंजीवनी विद्या मंत्र -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतामृत्युंजय भगवान् शिव

शिव साधनामहामृत्युंजय मंत्रमृतसंजीवनी विद्याशुक्रोपासनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

शुक्रोपासिता मृतसंजीवनी विद्या में स्रोत के अनुसार यह विद्या मृत्युंजय-मन्त्र और गायत्री-मन्त्र के योग से बनी हुई बतलाई गई है।

मूल मंत्र

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं, त्र्यम्बकं यजामहे,
भर्गो देवस्य धीमहि, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, धियो यो नः प्रचोदयात्,
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः
जूं हौं ॐ॥

बीज मंत्र

हौंजूंसः

साधना विधि

स्रोत के अनुसार यह विद्या मृत्युंजय-मन्त्र और गायत्री-मन्त्र के योग से बनी हुई बतलाई गई है; गायत्री और त्र्यम्बक मन्त्र के पादों को क्रम से लेकर आदि और अंत में ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः को लोम-विलोम से युक्त किया जाता है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • मृतसंजीवनी विद्या
  • शुक्रोपासना
  • मृत्युंजय मन्त्र और गायत्री मन्त्र योग
  • शिव साधना

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

१२. शुक्रोपासिता मृतसंजीवनी विद्या यह प्रसिद्ध है कि महर्षि शुक्राचार्य को अमृत-सिद्धि थी। इसी कारण वे असुरों के गुरु के रूप में सम्मान्य थे। जब देवासुरों का संग्राम होता और देवताओं के शस्त्रास्त्र से असुर घायल होते अथवा मर जाते तो उन्हें वे अपनी अमृत-सिद्धि से ही स्वस्थ एवं पुनरुज्जीवित कर देते थे। तन्त्रों में यह विद्या 'मृत्युंजय-मन्त्र और गायत्री-मन्त्र' के योग से बनी हुई बतलाई गई है। यथा— वेदादि-भूरादिपदत्रयं च, मध्ये कृतं मृत्युहरं त्रियम्बकम्। जपेत् फलार्थी विधिवत् प्रजप्य, प्रासाद-मृत्युंजयसम्पुटेन॥ इसके अनुसार १. गायत्री का प्रथम पाद, २. त्र्यम्बकं का प्रथम पाद, ३. गायत्री का द्वितीय पाद, ४. त्र्यम्बकं का द्वितीय पाद, ५. गायत्री का तृतीय पाद, ६. त्र्यम्बकं के शेष पाद दोनों और आदि अंत में ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः को लोम विलोम से युक्त करके यह मन्त्र बनाया जाता है। इसका स्वरूप इस प्रकार है—

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