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नवग्रह कवचरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

नवग्रह कवच पाठ और ग्रह शांति विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतानवग्रह

नवग्रह साधनाग्रह शान्तिरक्षा कवचकवच पाठरुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में नवग्रह सर्वांगीण परिचय तालिका के बाद सभी ग्रहों की प्रसन्नता एवं आत्मरक्षा के लिए '(च) नवग्रह कवच' का पाठ अत्यन्त उपयोगी बताया गया है। कवच के बाद फलस्तुति और नित्य पाठ, रोगी-स्पर्श पाठ, ग्रहण में पुरश्चरण तथा भोजपत्र पर लिखकर धारण करने का विधान दिया गया है।

मूल मंत्र

सभी ग्रहों की प्रसन्नता एवं आत्मरक्षा के लिए निम्नलिखित कवच का पाठ अत्यन्त उपयोगी है।

(च) नवग्रह कवच

ॐ शिरो मे पातु मार्तण्डः कपालं रोहिणीपतिः।
मुखमंगारकः पातु कण्ठं च शशिनन्दनः॥१॥
बुद्धिं जीवः सदा पातु हृदयं भृगुनन्दनः।
जठरं च शनिः पातु जिह्वां मे दितिनन्दनः॥२॥
पादौ केतुः सदा पातु वाराः सर्वांगमेव च।
तिथयोऽष्टौ दिशः पान्तु नक्षत्राणि वपुः सदा॥३॥
अंसौ राशिः सदा पातु योगश्च स्थैर्यमेव च। ॐ

फलस्तुति

सुचिरायुः सुखी पुत्री युद्धे च विजयी भवेत्॥४॥
रोगात् प्रमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
श्रियं च लभते नित्यं रिष्टिस्तस्य न जायते॥५॥
यः करे धारयेन्नित्यं तस्य रिष्टिं न जायते।
पठनात् कवचस्यास्य सर्वपापात् प्रमुच्यते॥६॥
मृतवत्सा च या नारी काकवन्ध्या च या भवेत्।
जीववत्सा पुत्रवती भवत्येव न संशयः॥७॥

उपर्युक्त रक्षा-कवच का नित्य पाठ करने से तथा आवश्यकता पड़ने पर रोगी का स्पर्श करके पाठ करने से रोग शान्त होता है। इसके ३ श्लोकों का ग्रहण में पुरश्चरण और भोजपत्र पर लिखकर धारण करने का भी विधान है। नित्य पाठ से पाप नाश होता है।

ग्रहों की प्रसन्नता के लिए इनके स्तोत्रों का पाठ; उपयुक्त वस्तुओं का दान तथा वारों के अनुसार ग्रहों के रंग वाले पुष्पों द्वारा उनके सहस्रनामों से उनके यन्त्रों अथवा प्रतिमाओं पर अर्चन करने का बहुत महत्त्व है और ऐसे प्रयोग तत्काल शुभ फल प्रदान करते हैं। अतः उन्हें भी प्राप्त करके पूजा-अर्चना करें। ग्रहों के धान्य से भी पूजा कर सकते हैं।

बीज मंत्र

साधना विधि

स्रोत में सभी ग्रहों की प्रसन्नता और आत्मरक्षा के लिए नवग्रह कवच पाठ को अत्यन्त उपयोगी बताया गया है। नित्य पाठ, आवश्यकता पड़ने पर रोगी का स्पर्श करके पाठ, ३ श्लोकों का ग्रहण में पुरश्चरण और भोजपत्र पर लिखकर धारण करने का विधान दिया गया है। आगे ग्रहों की प्रसन्नता के लिए स्तोत्र पाठ, उपयुक्त वस्तुओं का दान, वारों के अनुसार ग्रहों के रंग वाले पुष्पों से सहस्रनाम द्वारा यन्त्र या प्रतिमा पर अर्चन, और ग्रहों के धान्य से पूजा करने का विधान दिया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • नवग्रह कवच पाठ
  • ग्रह प्रसन्नता
  • आत्मरक्षा
  • ग्रह शान्ति
  • रोग शान्ति
  • भोजपत्र धारण विधान

लाभ

  • सभी ग्रहों की प्रसन्नता के लिए उपयोगी बताया गया
  • आत्मरक्षा के लिए उपयोगी बताया गया
  • रोगी का स्पर्श करके पाठ करने से रोग शान्त होने का वर्णन
  • नित्य पाठ से पाप नाश होने का वर्णन
  • फलस्तुति में बन्धन से मुक्ति, श्री-लाभ और सर्वपाप प्रमोचन का वर्णन

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

सभी ग्रहों की प्रसन्नता एवं आत्मरक्षा के लिए निम्नलिखित कवच का पाठ अत्यन्त उपयोगी है। (च) नवग्रह कवच ॐ शिरो मे पातु मार्तण्डः कपालं रोहिणीपतिः। मुखमंगारकः पातु कण्ठं च शशिनन्दनः॥१॥ बुद्धिं जीवः सदा पातु हृदयं भृगुनन्दनः। जठरं च शनिः पातु जिह्वां मे दितिनन्दनः॥२॥ पादौ केतुः सदा पातु वाराः सर्वांगमेव च। तिथयोऽष्टौ दिशः पान्तु नक्षत्राणि वपुः सदा॥३॥ अंसौ राशिः सदा पातु योगश्च स्थैर्यमेव च। ॐ फलस्तुति सुचिरायुः सुखी पुत्री युद्धे च विजयी भवेत्॥४॥ रोगात् प्रमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात्। श्रियं च लभते नित्यं रिष्टिस्तस्य न जायते॥५॥ यः करे धारयेन्नित्यं तस्य रिष्टिं न जायते। पठनात् कवचस्यास्य सर्वपापात् प्रमुच्यते॥६॥ मृतवत्सा च या नारी काकवन्ध्या च या भवेत्। जीववत्सा पुत्रवती भवत्येव न संशयः॥७॥ उपर्युक्त रक्षा-कवच का नित्य पाठ करने से तथा आवश्यकता पड़ने पर रोगी का स्पर्श करके पाठ करने से रोग शान्त होता है। इसके ३ श्लोकों का ग्रहण में पुरश्चरण और भोजपत्र पर लिखकर धारण करने का भी विधान है। नित्य पाठ से पाप नाश होता है। ग्रहों की प्रसन्नता के लिए इनके स्तोत्रों का पाठ; उपयुक्त वस्तुओं का दान तथा वारों के अनुसार ग्रहों के रंग वाले पुष्पों द्वारा उनके सहस्रनामों से उनके यन्त्रों अथवा प्रतिमाओं पर अर्चन करने का बहुत महत्त्व है और ऐसे प्रयोग तत्काल शुभ फल प्रदान करते हैं। अतः उन्हें भी प्राप्त करके पूजा-अर्चना करें। ग्रहों के धान्य से भी पूजा कर सकते हैं।

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