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संक्षिप्त श्रीयन्त्र पूजा मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

संक्षिप्त श्रीयन्त्र पूजा विधि और श्रीचक्र आवरण मंत्र -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतामहात्रिपुरसुन्दरी / श्रीविद्या / श्रीचक्रस्थितसुन्दरी

श्रीविद्या साधनाश्रीयन्त्र पूजाश्रीचक्र आवरण पूजामहात्रिपुरसुन्दरी उपासनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में विस्तृत पूजादि न कर पाने वाले साधकों के लिए संक्षिप्त श्रीयन्त्र पूजा की पद्धति दी गई है।

मूल मंत्र

ध्यानम्—
बालाकिरण-तेजसं त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं,
नानालंकृतिराजमानवपुषं बालोडुराड्-शेखराम् ।
हस्तैरीक्षुधनुः सृणीसुमशरान् पाशं मुदा बिभ्रतीं,
श्रीचक्रस्थितसुन्दरीं त्रिजगतामाधारभूतां भजे॥

१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अं आं सौः चतुरस्रत्रयात्मकत्रैलोक्यमोहन-
चक्राधिष्ठात्र्यै अणिमाद्यष्टाविंशतिशक्तिसहितप्रकटयोगिनीरूपायै
त्रिपुरादेव्यै नमः।

२. ॐ त्रिवृत्तात्मकत्रिवर्गसाधकचक्राधिष्ठात्र्यै कालरात्र्या-
दिसहितमातृकायोगिनीरूपायै त्रिपुरेशिनी देव्यै नमः।

३. ॐ ऐं क्लीं सौः षोडशदलपद्मात्मकसर्वाशापरिपूरक-
चक्राधिष्ठात्र्यै कामाकर्षिण्यादि षोडशशक्तिसहितगुप्तयोगिनीरूपायै
त्रिपुरेश्वरीदेव्यै नमः।

४. ॐ ह्रीं क्लीं सौः अष्टदल पद्मात्मकसर्वसंक्षोभणचक्राधिष्ठात्र्यै
अनङ्गकुसुमाद्यष्टशक्ति सहितगुप्ततरयोगिनीरूपायै त्रिपुरसुन्दरी-
देव्यै नमः।

५. ॐ हैं ह्क्लीं ह्सौः चतुर्दशारात्मक-सर्वसौभाग्य-
दायक चक्राधिष्ठात्र्यै सर्वसंक्षोभिण्यादि चतुर्दशशक्तिसहितसम्प्रदाय-
योगिनीरूपायै त्रिपुरावासिनीदेव्यै नमः।

६. ॐ हसैं हस्क्लीं हस्सौः बहिर्दशारात्मक सर्वार्थसाधकचक्रा-
धिष्ठात्र्यै सर्वसिद्धिप्रदादि दशशक्तिसहितकुलोत्तीर्णयोगिनीरूपायै
त्रिपुराश्रीदेव्यै नमः।

७. ॐ ह्रीं क्लीं ब्लूं अन्तर्दशारात्मकसर्वरक्षाकरचक्राधिष्ठात्र्यै
सर्वज्ञादिदशशक्तिसहित निगर्भयोगिनीरूपायै त्रिपुरमालिनीदेव्यै
नमः।

८. ॐ ह्रीं श्रीं सौः अष्टारात्मक सर्वरोगहर चक्राधिष्ठात्र्यै
वशिन्याद्यष्टशक्तिसहितरहस्ययोगिनीरूपायै त्रिपुरासिद्धादेव्यै नमः।

९. ॐ हसैं हस्क्ल्रीं हसौः त्रिकोणात्मक सर्वसिद्धिप्रदचक्रा-
धिष्ठात्र्यै कामेश्वर्यादि त्रिशक्तिसहितातिरहस्ययोगिनीरूपायै
त्रिपुराम्बादेव्यै नमः।

१०. ॐ (मूलमन्त्रः) बिन्द्वात्मकसर्वानन्दमयचक्राधिष्ठात्र्यै
षडङ्गायुधदशशक्तिसहितपरापरातिरहस्ययोगिनीरूपायै महात्रिपुर-
सुन्दरी देव्यै नमः।

बीज मंत्र

ऐंह्रींश्रींअंआंसौःक्लींहैंह्क्लींह्सौःहसैंहस्क्लींहस्सौःब्लूंहस्क्ल्रींहसौः

साधना विधि

स्रोत के अनुसार कलश और शंख (सामान्यार्घ्य पात्र) स्थापन करके आचमन, प्राणायाम, देशकाल संकीर्तन, श्रीगुरु, महागणपति, भगवती और महात्रिपुरसुन्दरी को प्रणाम कर पूजन करना चाहिए। ध्यान के पश्चात् मानसोपचार से सम्पूजन करके क्रमशः दस मंत्रों से अर्चन करना है और इसके पश्चात् नैवेद्यादि विधि करके नित्यकृत्य पूर्ण करना है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • संक्षिप्त श्रीयन्त्र पूजा
  • श्रीचक्र आवरण अर्चन
  • महात्रिपुरसुन्दरी पूजा
  • मानसोपचार पूजा
  • नित्यकृत्य पूजा

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

जो साधक इतने विस्तार से पूजादि नहीं कर पाएं उनके लिए आचार्यों ने अनेक प्रकार की लघु-पूजा विधियां भी बनाई हैं जिनमें कलश और शंख (सामान्यार्घ्य पात्र) स्थापन करके निम्नलिखित पद्धति से अर्चन करना चाहिए— अथ संक्षिप्त श्रीयन्त्र पूजा आचम्य प्राणानायम्य देशकालौ च संकीर्त्य। श्रीगुरुं महागणपतिं भगवतीं महात्रिपुरसुन्दरीं च प्रणम्य पूजयेत्। ध्यानम्— बालाकिरण-तेजसं त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं, नानालंकृतिराजमानवपुषं बालोडुराड्-शेखराम् । हस्तैरीक्षुधनुः सृणीसुमशरान् पाशं मुदा बिभ्रतीं, श्रीचक्रस्थितसुन्दरीं त्रिजगतामाधारभूतां भजे॥ इति ध्यात्वा मानसोपचारैः सम्पूजयेत् ततश्च— १. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अं आं सौः चतुरस्रत्रयात्मकत्रैलोक्यमोहन- चक्राधिष्ठात्र्यै अणिमाद्यष्टाविंशतिशक्तिसहितप्रकटयोगिनीरूपायै त्रिपुरादेव्यै नमः। २. ॐ त्रिवृत्तात्मकत्रिवर्गसाधकचक्राधिष्ठात्र्यै कालरात्र्या- दिसहितमातृकायोगिनीरूपायै त्रिपुरेशिनी देव्यै नमः। ३. ॐ ऐं क्लीं सौः षोडशदलपद्मात्मकसर्वाशापरिपूरक- चक्राधिष्ठात्र्यै कामाकर्षिण्यादि षोडशशक्तिसहितगुप्तयोगिनीरूपायै त्रिपुरेश्वरीदेव्यै नमः। ४. ॐ ह्रीं क्लीं सौः अष्टदल पद्मात्मकसर्वसंक्षोभणचक्राधिष्ठात्र्यै अनङ्गकुसुमाद्यष्टशक्ति सहितगुप्ततरयोगिनीरूपायै त्रिपुरसुन्दरी- देव्यै नमः। ५. ॐ हैं ह्क्लीं ह्सौः चतुर्दशारात्मक-सर्वसौभाग्य- दायक चक्राधिष्ठात्र्यै सर्वसंक्षोभिण्यादि चतुर्दशशक्तिसहितसम्प्रदाय- योगिनीरूपायै त्रिपुरावासिनीदेव्यै नमः। ६. ॐ हसैं हस्क्लीं हस्सौः बहिर्दशारात्मक सर्वार्थसाधकचक्रा- धिष्ठात्र्यै सर्वसिद्धिप्रदादि दशशक्तिसहितकुलोत्तीर्णयोगिनीरूपायै त्रिपुराश्रीदेव्यै नमः। ७. ॐ ह्रीं क्लीं ब्लूं अन्तर्दशारात्मकसर्वरक्षाकरचक्राधिष्ठात्र्यै सर्वज्ञादिदशशक्तिसहित निगर्भयोगिनीरूपायै त्रिपुरमालिनीदेव्यै नमः। ८. ॐ ह्रीं श्रीं सौः अष्टारात्मक सर्वरोगहर चक्राधिष्ठात्र्यै वशिन्याद्यष्टशक्तिसहितरहस्ययोगिनीरूपायै त्रिपुरासिद्धादेव्यै नमः। ९. ॐ हसैं हस्क्ल्रीं हसौः त्रिकोणात्मक सर्वसिद्धिप्रदचक्रा- धिष्ठात्र्यै कामेश्वर्यादि त्रिशक्तिसहितातिरहस्ययोगिनीरूपायै त्रिपुराम्बादेव्यै नमः। १०. ॐ (मूलमन्त्रः) बिन्द्वात्मकसर्वानन्दमयचक्राधिष्ठात्र्यै षडङ्गायुधदशशक्तिसहितपरापरातिरहस्ययोगिनीरूपायै महात्रिपुर- सुन्दरी देव्यै नमः। इसके पश्चात् नैवेद्यादि विधि करके नित्यकृत्य पूर्ण कर लें। रुद्रयामल में तो यहां तक लिखा है कि— आराधनाऽसमर्थश्चेद् दद्यादर्चन-साधनम् । यो दातुं नैव शक्नोति कुर्यादर्चन-दर्शनम् ॥

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