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स्मरण-योग्य पद्यरुद्रयामल तंत्रसंस्कृत + हिन्दी

श्री गुरु-स्मरण पद्य

श्रीदेवतागुरु, परमगुरु और परमेष्ठी गुरु

श्री गुरु उपासनागुरु-स्मरणरुद्रयामल

मूल मंत्र

शिरःस्थितसुपंकजे तरुण-कोटि-चन्द्रप्रभं,
वराभय-कराम्बुजं सकल-देवतारूपिणम्‌।
भजामि वरदं गुरुं किरण-चारु-शोभाकुलं,
प्रकाशित-पदद्वयाम्बुज-लसत्क-कोटिप्रभम्‌ ॥२/३८॥

जगद्भय-निवारणं भुवन-भोग-मोक्षप्रदं,
गुरोः पदयुगाम्बुजं जयति यत्र योगे जयम्‌।
भजामि परमं गुरुं नयन-पद्म-मध्यस्थितं,
भवाब्धि-भयनाशनं शमनयोगकायक्षयम्‌ ॥३९॥

प्रकाशित-सुपंकजे मृदुल-षोडशाख्ये प्रभुं
परापरगुरुं भजे सकल-बाह्यभोगप्रदम्‌।
विशालनयनाम्बुज-द्वय-तडित्प्रभामण्डलं,
कडार-मणिपाटलप्रभ-समुल्लसद्‌ बिन्दुकम्‌ ॥

चलाचल कलेवरं प्रचपले दले द्वादशे,
महौजसमुमापतेविगतदक्षभागे हृदि।
प्रभाकर-शतोज्ज्वलं सुविमलेन्दुकोट्याननं,
भजामि परमेष्ठिनं गुरुमतोव वारोज्ज्वलम्‌ ॥४१॥

साधना विधि

प्रातःकाल में निद्रा का त्याग करते ही हाथ, पैर मुखादि का प्रक्षालन करके पवित्रता-पूर्वक सहस्रार में गुरु, परमगुरु और परमेष्ठी गुरु का गुरूपदेशानुसार पादुकामंत्र-जप करके स्मरण करना चाहिए।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • उपासना-मार्ग के प्रत्येक अनुयायी के लिए गुरु-स्मरण का बड़ा महत्त्व है।