वराह अष्टाक्षर मंत्र प्रयोगरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
श्री वराह अष्टाक्षर मंत्र प्रयोग और ध्यान -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ श्रीवराह
वराह उपासनाभुवनेश्वरी उपासनातंत्र साधनारुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में वराह-मन्त्र-प्रयोग के अंतर्गत श्रीवराह का अष्टाक्षर मन्त्र, ऋषि-छन्द-देवता, पंचांग-न्यास, ध्यान और दशांश जप निर्देश दिया गया है।
मूल मंत्र
ॐ धूं वराहाय नमः कृष्णाङ्गं नीलवक्त्रं च मलिनं पद्मसंस्थितम् । पृथ्वीशक्तियुतं वन्दे शंखचक्राम्बुजं गदाम् ॥ धारयन्तं कराग्रेषु श्रीवराहप्रभुमुत्तमम् । भूलक्ष्मी-कान्ति-रतिभिः समन्तात् परिवारितम् ॥ हूं नमः शिवाय शक्त्या विना शिवे शुष्के नाम धाम न विद्यते । शिवं विना चिकल्लानां कलादि न वर्धते भवेत् ॥
बीज मंत्र
धूंहूं
साधना विधि
स्रोत के अनुसार पूर्वाम्नाय से वराह की उपासना होती है। मन्त्र के ब्रह्मा ऋषि, जगती छन्द और वराह देवता हैं। अष्टाक्षर मन्त्र से पंचांग-न्यास होता है। ध्यान के बाद पृथ्वी देवी के मन्त्र का जप भी इनके साथ होता है। उन्मनी, अन्नपूर्णा और भुवना रूप में भुवनेश्वरी का त्रिकाल जप करने पर 'हूं नमः शिवाय' इस मन्त्र का दशांश जप करना चाहिए और अन्नपूर्णी के मन्त्रजप से पूर्व स्वर्णाकर्षण भैरव के मन्त्र का दशांश जप करना अद्भुतम् माना गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- वराह उपासना
- अष्टाक्षर मन्त्र जप
- पंचांग-न्यास
- ध्यान
- पृथ्वी देवी के मन्त्र का जप
- दशांश जप
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
(घ) वराह-मन्त्र-प्रयोग विष्णु के अवतारों के साथ भुवनेश्वरी देवी का ऐक्य होने पर भगवान् वराह इनके साथ उपास्य हैं। पूर्वाम्नाय से उनकी उपासना होती है। श्रीवराह का अष्टाक्षर मन्त्र है--'ॐ धूं वराहाय नमः'। इस मन्त्र के ब्रह्मा ऋषि, जगती छन्द, वराह देवता है। अष्टाक्षर मन्त्र से ही पंचांग-न्यास होता है। इनका ध्यान इस प्रकार है-- कृष्णाङ्गं नीलवक्त्रं च मलिनं पद्मसंस्थितम् । पृथ्वीशक्तियुतं वन्दे शंखचक्राम्बुजं गदाम् ॥ धारयन्तं कराग्रेषु श्रीवराहप्रभुमुत्तमम् । भूलक्ष्मी-कान्ति-रतिभिः समन्तात् परिवारितम् ॥ इनकी शक्ति धरणी-पृथ्वी है। तदनुसार पृथ्वी देवी के मन्त्र का जप भी इनके साथ होता है। वैसे उन्मनी, अन्नपूर्णा और भुवना के रूप में भुवनेश्वरी का त्रिकाल जप करने पर 'हूं नमः शिवाय' इस मन्त्र का दशांश जप करना चाहिए और अन्नपूर्णी के मन्त्रजप से पूर्व स्वर्णाकर्षण भैरव के मन्त्र का दशांश जप करना अद्भुतम् माना गया है। क्योंकि-- शक्त्या विना शिवे शुष्के नाम धाम न विद्यते । शिवं विना चिकल्लानां कलादि न वर्धते भवेत् ॥ यह आगमों का आदेश है।
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