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श्रीविद्या उद्घाटन कवचरुद्रयामल तंत्रहिन्दी

श्रीविद्या उद्घाटन कवच पाठ और भय निवारण स्तोत्र -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताश्रीविद्या / त्रिपुरा / श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी

श्रीविद्या साधनाउद्घाटन कवचशक्ति उपासनारुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में शक्ति-उपासकों के लिए 'उद्घाटन कवच' स्तोत्र के रूप में यह कवच दिया गया है।

मूल मंत्र

मूलाधारे स्थिता देवि, त्रिपुरा चक्रनायिका।
नृजन्मभीति-नाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥१॥
स्वाधिष्ठानाख्यचक्रस्था, देवी श्रीत्रिपुरेशिनी।
पशुबुद्धिं नाशयित्वा, सर्वैश्वर्यप्रदाऽस्तु मे ॥२॥
मणिपूरे स्थिता देवी, त्रिपुरेशीति विश्रुता।
स्त्रीजन्म-भीतिनाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥३॥
स्वस्तिके संस्थिता देवी, श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी।
शोकभीति-परित्रस्तं, पातु मामनघं सदा ॥४॥
अनाहताख्य-निलया, श्रीमत्त्रिपुरवासिनी।
अज्ञानभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥५॥
त्रिपुराश्रीरिति ख्याता विशुद्धाख्य-स्थलस्थिता।
जरोद्भव-भयात् पातु, पावनी परमेश्वरी ॥६॥
आज्ञाचक्रस्थिता देवी त्रिपुरामालिनी तु या।
सा मृत्युभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥७॥
ललाट-पद्म-संस्थाना, सिद्धा या त्रिपुरादिका।
सा पातु पुण्यसम्भूतिभीति-संघात् सुरेश्वरी ॥८॥
त्रिपुराम्बेति विख्याता, शिरःपद्मे सुसंस्थिता।
सा पापभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥९॥
ये पराम्बापदस्थान--गमने विघ्न-सञ्चयाः।
तेभ्यो रक्षतु योगेशी, सुन्दरी सकलातिहा ॥१०॥

साधना विधि

स्रोत के अनुसार इस 'उद्घाटन कवच' स्तोत्र का भक्तिपूर्वक अजपा जप के पश्चात् पाठ करना अत्यन्त लाभप्रद माना गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • उद्घाटन कवच पाठ
  • श्रीविद्या साधना
  • शक्ति उपासना
  • अजपा जप के पश्चात पाठ
  • भय निवारण प्रार्थना

लाभ

  • नृजन्मभीति-नाशार्थं
  • पशुबुद्धि नाश
  • स्त्रीजन्म-भीतिनाशार्थं
  • शोकभीति से रक्षा
  • अज्ञानभीति से रक्षा
  • जरोद्भव-भय से रक्षा
  • मृत्युभीति से रक्षा
  • पापभीति से रक्षा
  • विघ्न-सञ्चय से रक्षा

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

संभवतः इसी दृष्टि से 'रुद्रयामल' में शक्ति-उपासकों के लिए एक 'उद्घाटन कवच' स्तोत्र दिया है, जिसका भक्तिपूर्वक अजपा जप के पश्चात् पाठ करना अत्यन्त लाभप्रद माना गया है। यह कवच इस प्रकार है— मूल-पाठः-- मूलाधारे स्थिता देवि, त्रिपुरा चक्रनायिका। नृजन्मभीति-नाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥१॥ स्वाधिष्ठानाख्यचक्रस्था, देवी श्रीत्रिपुरेशिनी। पशुबुद्धिं नाशयित्वा, सर्वैश्वर्यप्रदाऽस्तु मे ॥२॥ मणिपूरे स्थिता देवी, त्रिपुरेशीति विश्रुता। स्त्रीजन्म-भीतिनाशार्थं, सावधाना सदाऽस्तु मे ॥३॥ स्वस्तिके संस्थिता देवी, श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी। शोकभीति-परित्रस्तं, पातु मामनघं सदा ॥४॥ अनाहताख्य-निलया, श्रीमत्त्रिपुरवासिनी। अज्ञानभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥५॥ त्रिपुराश्रीरिति ख्याता विशुद्धाख्य-स्थलस्थिता। जरोद्भव-भयात् पातु, पावनी परमेश्वरी ॥६॥ आज्ञाचक्रस्थिता देवी त्रिपुरामालिनी तु या। सा मृत्युभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥७॥ ललाट-पद्म-संस्थाना, सिद्धा या त्रिपुरादिका। सा पातु पुण्यसम्भूतिभीति-संघात् सुरेश्वरी ॥८॥ त्रिपुराम्बेति विख्याता, शिरःपद्मे सुसंस्थिता। सा पापभीतितो रक्षां, विदधातु सदा मम ॥९॥ ये पराम्बापदस्थान--गमने विघ्न-सञ्चयाः। तेभ्यो रक्षतु योगेशी, सुन्दरी सकलातिहा ॥१०॥

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