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स्वर्णाकर्षण भैरव महामंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

स्वर्णाकर्षण भैरव दारिद्र्य नाश महामंत्र और जप विधान -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताश्रीस्वर्णाकर्षण भैरव

स्वर्णाकर्षण भैरव साधनाभैरव मंत्रदारिद्र्य नाश मंत्रमन्त्र-विधान

तंत्र संदर्भ

६. रुद्रयामलोक्त श्री स्वर्णाकर्षण भैरव साधना

श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव-मन्त्र-विधान एवं स्तोत्र 'चिदम्बर-रहस्य' के अनुसार श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव की उपासना के लिए यहां संक्षेप में मन्त्र-विधान एवं पाठ के लिए स्तोत्र दिया गया है।

मूल मंत्र

ॐ ऐं क्लीं क्लीं ब्लूं हां हीं हूं सः वं आपदुद्धारणाय अजामल-बद्धाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षणभैरवाय मम दारिद्र्यविद्वेषणाय ॐ हीं महाभैरवाय नमः।

बीज मंत्र

हीं

विनियोग

१. विनियोग—ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरवमहामन्त्रस्य महाभैरव-ब्रह्मा ऋषिः त्रिष्टुप्छन्दः त्रिमूर्तिरूपी भगवान् स्वर्णाकर्षण-भैरवो देवता हीं बीजं सः शक्तिः वं कीलकं मम दारिद्र्यनाशार्थं जपे विनियोगः।

न्यास

२. ऋष्यादिन्यास—ॐ महाभैरवब्रह्मर्षये नमः (शिरसि), त्रिष्टुप्छन्दसे नमः (मुखे), त्रिमूर्तिरूपी-भगवत्स्वर्णाकर्षणभैरवदेवतायै नमः (हृदये), हीं बीजाय नमः (गुह्ये), सः शक्तये नमः (पादयोः), वं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)।

३. कर-न्यास—ॐ (अंगुष्ठाभ्यां नमः)। ऐं (तर्जनीभ्यां नमः)। क्लीं हां (मध्यमाभ्यां नमः)। क्लीं हीं (अनामिकाभ्यां नमः)। क्लीं हूं (कनिष्ठिकाभ्यां नमः)। सं वं (करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः)।

४. हृदयादि न्यास—आपदुद्धारणाय (हृदयाय नमः), अजामलबद्धाय (शिरसे स्वाहा), लोकेश्वराय (शिखायै वषट्), स्वर्णाकर्षणभैरवाय (कवचाय हुम्), मम दारिद्र्यविद्वेषणाय (नेत्रत्रयाय वौषट्), श्रीमहाभैरवाय नमः (अस्त्राय फट्)। रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः।

ध्यान

५. ध्यानम्— ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम्। अक्षयं स्वर्णमाणिक्य-तडित्पूरितपात्रकम्॥१॥ अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्भवम्। सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम्॥२॥

मन्दारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य-सिंहासने, संविष्टोदरभिन्नचम्पकरुचा देव्या समालिङ्गितः। भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णं ददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण-भैरवो विजयते स्वर्णाकृतिः सर्वदा॥

साधना विधि

इन पद्यों से ध्यान तथा मानसिक उपचारों से पूजा करके मन्त्र जप करें। इस मन्त्र का जप करें। १० हजार जप करके दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन कराने से दरिद्रता का नाश, ऋण का निवारण तथा सर्वविध सुख की प्राप्ति होती है। पायस तथा बिल्व से हवन करें। कृष्णपक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तक जप का विशेष महत्त्व है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • स्वर्णाकर्षण भैरव साधना
  • दारिद्र्य नाश
  • ऋण निवारण
  • मन्त्र-जप
  • दशांश हवन

लाभ

  • दरिद्रता का नाश
  • ऋण का निवारण
  • सर्वविध सुख की प्राप्ति