महामृत्युंजय मन्त्र सम्पुटरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
तान्त्रिक शिव संजीवनी प्रयोग महामृत्युंजय मंत्र सम्पुट -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ महामृत्युंजय शिव
महामृत्युंजय मन्त्रशिव संजीवनी प्रयोगरुद्रपाठ सम्पुटरुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में तान्त्रिक-शिव-सञ्जीवनी-प्रयोग के भीतर "मन्त्र सम्पुट" का स्वरूप दिया गया है।
मूल मंत्र
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे। सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ गणानान्त्वा गणपतिग्वं हवामहे, प्रियाणान्त्वा प्रियपति ग्वं हवामहे, निधीनान्त्वा निधिपति ग्वं, हवामहे वसोमम। आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्। ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे। सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥
बीज मंत्र
हौंजूंसः
साधना विधि
अनुष्ठान की पद्धति के अनुसार स्नान, पूजा से निवृत्त होकर आसन, आसन शुद्धि, शिखा बन्धन, आत्म शुद्धि, आचमन, रुद्रसुक्त, संकल्प, भूमि-वाराह-शेष-कूर्म पूजन, कलश पूजा, आत्मप्रोक्षण, पंचगव्य प्राशन, दीपक पूजन, दिग्रक्षा, गणपति पूजन, षोडशमातृका पूजन, नवग्रह पूजन, कलश पूजन, ब्राह्मण-वरण, पुण्याहवाचन तथा प्रधान-देवता शिव का षोडशोपचार पूजन बतलाया गया है। आगे शान्ति-कवच, चावल का आवरण, बिल्व-पत्र, अभिषेक-पात्र, सम्पुटित सरल रुद्रपाठ, उत्तर पूजा, आरती और निर्माल्य/शान्ति-कवच विसर्जन का विधान दिया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- तान्त्रिक शिव संजीवनी प्रयोग
- महामृत्युंजय मन्त्र सम्पुट
- सम्पुटित सरल रुद्रपाठ
- शान्ति-कवच
- रुद्र मन्त्र के दोनों ओर सम्पुट
लाभ
- सम्पुटित सरल रुद्रपाठ
- शान्ति-कवच प्रयोग
- कवच व मृत्युंजय सम्पुट ही इस प्रयोग के प्राण हैं
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
४. तान्त्रिक-शिव-सञ्जीवनी-प्रयोगः अनुष्ठान की पद्धति के अनुसार स्नान, पूजा से निवृत्त होकर आसन पर बैठें। आसन शुद्धि करें। शिखा बन्धन करें। आत्म शुद्धि करें, आचमन करें। फिर रुद्रसुक्त पढ़ें, संकल्प ग्रहण करें। भूमि, वाराह, शेष, कूर्म का पंचोपचार से पूजन करें। क्रमानुसार फिर कलश को संक्षिप्त पूजा करके जल को अभिमन्त्रित कर आत्मप्रोक्षण पूजा सामग्री का प्रोक्षण करें। पंचगव्य प्राशन कर लें। उचित समझें तो सर्वप्रथम दशविध स्नान भी करें। दीपक का पूजन करें। दिग्रक्षा का विधान करें तथा गणपति के पूजन, अभिषेक, आरती व पुष्पांजलि से निवृत्त होकर षोडशमातृका पूजन, नवग्रह पूजन, कलश पूजन, ब्राह्मण-वरण (११ ब्राह्मणों की आवश्यकता होगी) पुण्याहवाचन तथा प्रधान-देवता शिव का षोडशोपचार से पूजन करें। ब्राह्मणों को यथा-योग्य वरण-साहित्य प्रदान करें। ध्यान से लेकर पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पंचामृत-स्नान, शुद्धस्नान, वस्त्र, उपवस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, शमीपत्र, बिल्वपत्र, अबीर, गुलाल, परिमल द्रव्य, धूप, दीपक, नैवेद्य, ऋतुफल, आचमन, अखण्ड ऋतुफल, पान, सुपारी, लवंग, इलायची, कर्पूर (नागवल्ली-वीटिका) व द्रव्यदक्षिणा समर्पण करें। तदनन्तर मूर्ति (लिंग) के आकार की विशालता या लघुता का ध्यान रखकर साफ चावलों को शुद्ध जल से धोकर शुद्ध जल में पकावें। पक जाने पर उन्हें शीतल कर लें। घी, मधु व थोड़ी-सी शर्करा उनमें मिलावें। फिर उसे आटे की तरह एक जीव, एकरस व एकरूप कर दें। मूर्ति (लिंग) पर से पूजा सामग्री को उतार कर शान्ति व विश्वासपूर्वक सन्नद्ध होकर “नमस्ते रुद्रमन्यव...” आदि १६ मन्त्रों के ‘रुद्रसुक्त’ द्वारा चावलों का आवरण शिव मूर्ति पर चढ़ा देवें, ऊपर से घृत का सामान्य लेप लगा दें, ताकि असमय व अभिषेक के बीच में कवच-भंग न हो। ११ पण्डित प्रथम नीराजन व पुष्पांजलि से निवृत्त होकर पहले गणेश-मन्त्र के अंगन्यास, करन्यास व १०८ बार जप करें। फिर अघोर मन्त्र के अंगन्यासादि करें तथा नियमानुसार रुद्रपाठ के अंगन्यास व करन्यास कर महामृत्युंजय मन्त्र सम्पुटित सरल रुद्रपाठ प्रारम्भ करें। शान्ति-कवच पर बिल्व-पत्र चढ़ा देवें ताकि जलधारा बिल्व-पत्र का स्पर्श करती रहे। अभिषेक-पात्र का पूजन-कलश की तरह कर लेना चाहिए। ऊपर श्वेत वस्त्र बांध दें। वस्त्रपूत जल ही पूजा के कार्य में ग्राह्य माना गया है। पात्र में दूध, गन्ने का रस, नारियल का जल, कुश, तीर्थजल, शर्करा व मधु मिला देना चाहिए। सांगोपांग पाठ पूर्ण हो जाने पर शान्ति-कवच को निकाल दें तथा पुनः विधिवत् उत्तर पूजा करें। आरती करें। एवं अवशिष्ट भोजन, दक्षिणा आदि का कार्य सम्पादित करें। निर्माल्य व शान्ति-कवच को पवित्र जल में प्रवाहित कर दें। अन्य पशु मुंह नहीं लगावें और पैरों में नहीं आ सके, ऐसा प्रबन्ध करें या फिर गौ माता को खिला देवें। ‘मन्त्र सम्पुट’ का स्वरूप इस प्रकार होगा— ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे। सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ गणानान्त्वा गणपतिग्वं हवामहे, प्रियाणान्त्वा प्रियपति ग्वं हवामहे, निधीनान्त्वा निधिपति ग्वं, हवामहे वसोमम। आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्। ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे। सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥ निर्देश—दो बार सम्पुट का उच्चारण करना चाहिए ताकि रुद्र मन्त्र के दोनों ओर सम्पुट लग सके। सम्पुट रहित पाठ असफल होता है। कवच व मृत्युंजय सम्पुट ही इस प्रयोग के प्राण हैं। महामृत्युंजय मन्त्र के अंगन्यास, करन्यास आदि विधिपूर्वक पहले कर लेने चाहिए। बाद में सम्पुटित पाठ प्रारम्भ करें। यह स्मरण रखें।
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