गायत्री स्तवराजरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
त्रिपदा गायत्री स्तवराज मंत्र जप विधि और फल -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ त्रिपदा गायत्री
गायत्री साधनास्तवराजबीज मंत्र साधनातंत्र साधनारुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में 'गायत्री-साधना और रुद्रयामल' के अंतर्गत मुक्तिचिन्तामणि गायत्री-कवच के बाद त्रिपदा गायत्री-स्तवराज प्रस्तुत किया गया है।
मूल मंत्र
त्रिपदा गायत्री-स्तवराज विनियोग--अस्य श्रीत्रिपदागायत्री स्तवराजस्य शिव ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्द--त्रिपदा-गायत्रीदेवता ॐ बीजं शिवः शक्तिः खं गं कीलकं मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे पाठे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास--शिव ऋषये नमः (शिरसि), त्रिष्टुप्छन्दसे नमः (मुखे), त्रिपदागायत्रीदेवतायै नमः (हृदये), ॐ बीजाय नमः (गुह्ये), शिवः शक्तये नमः (पादयोः), खं गं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। कर-हृदयादिन्यास--क्रमशः--हां; हीं, हूं, हैं, हौं, हः (इत्यादिभिः)। ध्यानम्-- चतुर्भुजां सूर्यसहस्रकोटिभां, त्रिलोचनां हार-किरीट-शोभिताम् । चतुर्मुखाढ्योपगतां महोज्ज्वलां, वेदेश्वरीं पञ्चमुखीं भजाम्यहम् ॥१॥ विविध-मणि-मयूख-स्फीत-केयूर-हार-- प्रवर-कनककाञ्ची-किङ्किणी-कङ्कणाढ्याम् । सकल-भुवन-रक्षा-सृष्टि-संहार-कर्त्री, निगम-परम-विद्यामाश्रये वेद-धात्रीम् ॥२॥ (इति ध्यात्वा मानसोपचारैः सम्पूज्य स्तवराजं पठेत्।) प्रणवं मनुराजमौलिरत्नं, यदि वेदेश्वरि! वेदसारभूतम् । प्रजपेद् हृदये दयासमुद्रं, स भवेद् ब्रह्मविदीश्वरो रविर्वा ॥१॥ शंकां जपेद् योऽत्र विहाय शंकां, कंकालमालाभरणां निशीथे । कृशानु-भानु-प्रभया समानो, विमानचारी स भवेत् स-मानः ॥२॥ क-बीजमन्त्रं शिव-शक्तिरूपं, त्रिभिर्जपेद् यस्त्रिपदा-स्वरूपम् । स कामुकः कामकलाविदग्धो, भवेत् तु रम्भारतिभोगभागी ॥३॥ तार्तीयबीजं तव मन्त्रमध्ये, जपेद् भवानि! स्मरतत्त्वचेता: । समेतकामान् समवाप्य भूमौ, भवेत् स भूपालवधू-जनेन्द्रः ॥४॥ वाणीं च वाणीरतले जपेद्यो, दशायुतं दुर्धयाङ्गिभूतः । स वैरिगर्वं समरे निहत्य, भवेद् भवानी-तनयो दिवीन्द्रः ॥५॥ स्मरं जपेद् यस्तव मन्त्रबीजं, त्रिलोचने! लोचनभोगकामी । सुलोचना-लोचन-वीक्षणोर-प्रभाव-पीयूष-रसाकुलात्मा ॥६॥ परां जपेद् यः परमार्थतथ्यां, निर्वाणरथ्यां तव पंचवक्त्रे! । समस्तलोकाधिपतिः पुरेशो, भवेत् परानुग्रह-भाजनं सः ॥७॥ लक्ष्मीं जपेद् यः परवर्गभीतः, श्मशानभूमौ शिवरूपधारी । तस्यात्र वश्या कमलाकरस्था, या विष्णुपत्नी कमलाकरस्था ॥८॥ भीमां जपेद् यो वरतान्तकाले, नितान्तमम्भोजदलं करस्थाम् । स भीमरूपोऽरिदलं निहत्य, प्रान्ते लभेत् कान्तपदं त्रिपाद्याः ॥९॥ मठं जपेद् यः शुचिरर्चनीयां, चतुर्भुजां हव्यभुजः समक्षम् । स गाणपत्यं प्रणिपत्य लब्ध्वा, लक्ष्मीं भवेदीश्वर-सिद्धिनाथः ॥१०॥ गायत्री-त्रिविधाक्षरत्रयमिदं वेदार्थतत्त्वं परं, यो ध्यायेद् हृदयारविन्दकुहरे प्रातर्निशीथे तथा । चैनाचार-विचारमार्ग-निपुणो वेदान्तसारदयं, प्रोद्भूतागमतत्त्ववित् स त्रिपदीधाम स्वयं यास्यति ॥११॥ रामायुगं यो गिरियोनिगर्भान्तरे जपेच्चिद्गिरिशां सरम्भया । स योगिगम्यो गरुगर्वहारी, गिराभवेदिन्द्र-समर्चिताङ्घ्रिः ॥१२॥ मायां जपेद् यः स्मरसक्तचेता, जटाकिरीटेन्दु-कलत्रवान् यः । स वैष्णवेन्द्रो ललनाऽथ योनिस्फुरन्मणिः स्यान्नितरां नताङ्घ्रिः ॥१३॥ माबीजनिन्दुस्फुरितोर्ध्वबीजं, जपेन्निशीथे मणिपीठ-संस्थः । यो धीरमात्रैकपरः स सद्यो, भवेद् धरायां नृपसार्वभौमः ॥१४॥ मायापुटां योऽत्र जपेद् रतादौ, तन्वीसुखासक्तमुखो निशान्ते । स लोकपालार्चित-पादपद्मो भवेद् भवान्ते भवनाधिनाथः ॥१५॥ वाणीं जपेद् यो जडभावयुक्तो, वेदान्त-तत्त्वेकरसो भवानि । तस्यास्यपद्मे वसति विधाय, विभर्ति वाणी विदुषां सभायाम् ॥१६॥ यो वायुपूजां सुरभावतेजा, जपेन्निशीथे शशिखण्डचूडः । स वायुपूज्यो बलवान् प्रयाति, तद्धाम सत्यं त्रिदिवेन्द्रतुल्यः ॥१७॥ मन्त्रं मनोऽन्तर्जपति स्मरार्तो, यो वेदमातुर्दिवसावसाने । वश्योर्वशी तस्य पदारविन्दं, शुश्रूषमाणा भविता भवानि! ॥१८॥ मन्त्रान्तस्थां ठद्वयीं वै जपेद् यस्तेजोरूपं साधकः साधकेशि! । तस्यास्ये स्याद् भारती तस्य हस्ते लक्ष्मीः कुर्याद् वासमाकल्प-कलाम् ॥१९॥ भोगै-वृत्तत्रय-षोडशार-दिक्कोणयुतां निविराजमानाम् । निषेन्दुवीं शीघ्र-रसाकुलाक्षीं, व्यक्षीं त्रिमूर्ति त्रिपदीं भजामि ॥२०॥ देवि त्रैलोक्यमातर्विविधकुसुमसत्पद्ममालायुधाढ्ये, नानारत्नप्रभाढ्ये त्रिनयनविलसत्सूर्यचन्द्राग्निबिम्बे! । पीठस्थे पंचवक्त्रे धवलमणिनिभे भासुरे नूपुराढ्ये!, श्रीमन्नीलोत्पलाभे त्रिपदि वरकरे देवि मातः! प्रसीद ॥२१॥ इति स्तोत्रं पुण्यं पर-मनुमयं तत्त्व-सहितं, पठेद् यो गायत्र्या निशि कुजदिने वाऽपि सततम् । स वेदान्तस्यागम-पुर-पुराणार्थ-निपुणो, लभेल्लक्ष्मीं प्रान्ते परमपदवीं मान्तिकपतिः ॥२२॥
बीज मंत्र
ॐखंगंहांहींहूंहैंहौंहःप्रणवक्लींऐंह्रींहसौःश्रींस्त्रींठः
साधना विधि
विनियोग, ऋष्यादिन्यास और कर-हृदयादिन्यास के पश्चात् ध्यान करके मानसोपचारों से सम्पूज्य स्तवराज का पाठ करे। स्रोत में इस स्तोत्र का पाठ रात्रि में तथा मंगलवार के दिन करने का विशेष निर्देश दिया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- त्रिपदा गायत्री स्तवराज पाठ
- गायत्री मन्त्र बीज योजना
- मन्त्र जप विधि
- रात्रि पाठ
- मंगलवार पाठ
- मानसोपचार पूजन
लाभ
- गायत्री मन्त्र के साथ भिन्न-भिन्न बीजमन्त्रों की योजना का विधान
- अभीष्ट फलों का निर्देश
- वेदान्त, आगम, पुराणार्थ में निपुणता का वर्णन
- लक्ष्मी प्राप्ति और परमपद प्राप्ति का वर्णन
- रात्रि और मंगलवार पाठ का निर्देश
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
गायत्री के अन्यान्य स्तवराजों की अपेक्षा यह स्तवराज अपनी एक विशिष्टता के कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। और वह है--'गायत्री-मन्त्र के साथ भिन्न-भिन्न बीजमन्त्रों की योजना करके उनका जप करने का विधान और उनके जप से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फलों का निर्देश।' प्रत्येक कार्य के लिए किस प्रकार स्वतन्त्र मन्त्र-योजना करनी चाहिए? यह जानने के लिए इसका परिज्ञान अपेक्षित है, अतः मूल-पाठ प्रस्तुत है-- त्रिपदा गायत्री-स्तवराज ... लभेल्लक्ष्मीं प्रान्ते परमपदवीं मान्तिकपतिः ॥२२॥ इसके पश्चात् पांच श्लोकों में इस स्तोत्र का महत्त्व वर्णित है जिनमें इसकी रहस्यमयता, पंचांग-सार तथा चारों वेदों का रहस्य बतलाया है। वस्तुतः यह स्तवराज स्तुति की अपेक्षा गायत्री मन्त्र के साथ भिन्न-भिन्न बीजमन्त्र के साथ जप करने की प्रक्रिया और उसके द्वारा प्राप्य फलों का ही विशेष रूप से निर्देश करता है। यद्यपि इसमें यह बात स्पष्ट रूप से नहीं बतलाई गई है कि गायत्री-मन्त्र में ही इन बीजों को सम्पुटित अथवा सन्दर्भित किया जाए अथवा इनका स्वतन्त्र रूप से ही जप किया जाए? किन्तु ऐसे अन्यत्र संकेत प्राप्त होते हैं तथा गायत्री मन्त्र के जो विभिन्न रूप पूर्व महर्षियों द्वारा दृष्ट हैं उनमें ऐसी व्यवस्था दी है। साथ ही इस स्तोत्र में 'प्रणव, क्लीं, ऐं, ह्रीं, हसौः, श्रीं, स्त्रीं, हूं, ठः ठः' आदि बीजों के प्रयोग ही अधिक वर्णित हैं, जिनसे तन्त्र-साधक परिचित हैं। एक पद (२०वां) गायत्री-मन्त्र का सूचक है, जिसमें १. भूपुर, २. वृत्तत्रय, ३. षोडशार, ४. दशकोण तथा ५. त्रिकोण का विधान है। इस स्तोत्र का पाठ रात्रि में तथा मंगलवार के दिन करने का विशेष निर्देश है। तदनुसार पाठ करके भी लाभान्वित होना चाहिए।
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