उच्छिष्ट महागणपति प्रयोग मंत्र -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ उच्छिष्ट महागणपति
तंत्र संदर्भ
महागणपति की साधना 'गाणपत्य-सम्प्रदाय' में विविध रूपों में प्रचलित है। प्रत्येक देवता की उपासना १. वैदिक, २. तांत्रिक और ३. पौराणिक पद्धतियों से की जाती है। ऐसी ही परम्परा में 'उच्छिष्ट' उपासना ने प्रसार पाया। यह 'उच्छिष्ट' शब्द प्रचलित अर्थ में तो 'झूठन' अर्थ ही बतलाता है, किन्तु ऐसा नहीं है। यह उससे आगे बढ़कर अधिक अनुशासित और अनुशासक के अर्थ को अभिव्यक्त करता है। साधक के लिए साधना में अनुशासित रहना तथा प्राप्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए तदनुकूल अनुशासन करना ही इस उच्छिष्ट शब्द का वास्तविक अर्थ ग्राह्य है।
मूल मंत्र
उच्छिष्ट महागणपति प्रयोग के लिए मन्त्र इस प्रयोग में निम्नलिखित मन्त्रों में से किसी एक मन्त्र का जप किया जाता है। १. नवाक्षरी-(नवार्ण)—हस्ति पिशाचिलिखे स्वाहा। २. दशाक्षरी—ह्लीं गं ह्लीं वशमानय स्वाहा। ३. द्वादशाक्षरी—ॐ ह्रीं गं हस्तिपिशाचि लिखे स्वाहा। ४. द्वातिंशाक्षरी—ॐ हस्तिमुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने आं क्रों ह्लीं क्लीं ह्रीं हूं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा। ५. त्रयस्त्रिंशाक्षरी—ॐ क्लीं महारजतवल्लभोच्छिष्ट गणपतये सर्वराज्ञां धनमानय क्लीं धनं देहि स्वाहा। ६. सप्ततिंशाक्षरी—ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट महात्मने आं क्रों ह्रीं गं घे घे स्वाहा।
बीज मंत्र
अर्थ एवं भावार्थ
अर्थात् कृष्णपक्ष की चतुर्थी से शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक मधु से गणपति की मूर्ति को स्नान एवं पूजन कराके उन्हें गुड़ तथा पायस का नैवेद्य लगाता है और उस प्रसाद को ग्रहण करके प्रतिदिन एक हजार मन्त्र का जप करता है। उस पर भगवान् गणपति प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की समिधाओं से हवन का भी विधान है, जिससे सर्वविध लाभ होता है।
विनियोग
अस्य श्री उच्छिष्ट महागणपतिनवार्णमन्त्रस्य कंकोलऋषिः विराट्छन्दः उच्छिष्टमहागणपतिर्देवता मम मनोऽभिलषितसिद्धये जपे विनियोगः।
न्यास
ऋषिन्यास—ॐ कंकोलऋषये नमः (शिरसि), ॐ विराट् छन्दसे नमः (मुखे), ॐ उच्छिष्टमहागणपतये नमः (हृदये) ॐ विनियोगाय नमः (सर्वांगे)।
कर-हृदयादि-न्यास ॐ हस्ति (अंगुष्ठाभ्यां नमः—हृदयाय नमः) ॐ पिशाचि (तर्जनीभ्यां नमः—शिरसे स्वाहा) ॐ लिखे (मध्यमाभ्यां नमः—शिखायै वषट्) ॐ स्वाहा (अनामिकाभ्यां नमः—कवचाय हुम्) ॐ हस्ति पिशाचि लिखे (कनि०—नेत्रत्रयाय वौषट्) ॐ हस्तिपिशाचि लिखे स्वाहा (करतल०—अस्त्राय फट्)
ध्यान
चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशाङ्कुशौ मोदक-पात्र-दन्तौ ॥ करैर्दधानं सरसीरुहस्थ- मुन्मत्तमुच्छिष्ट गणेशमीडे ॥
साधना विधि
इनमें प्रथम-मन्त्र का विधान निम्नलिखित है।
उच्छिष्ट गणपति के मन्त्र का एक लाख जप करने से पुरश्चरण होता है। देवता को मोदक और ताम्बूल अर्पित करें और स्वयं उसमें से प्रसाद लेकर जप करें। पुरश्चरण की विधि पूर्ण होने पर प्रयोग करने की पात्रता प्राप्त होती है। प्रयोग के लिए—
१. अपने हाथ के अंगूठे के बराबर गणेश की लाल चन्दन से प्रतिमा बनाकर पूजन करने से मनोरथ सिद्धि होती है। २. श्वेत अर्क से मूर्ति बनाकर मधु से कृष्णपक्ष की चतुर्थी से शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तक प्रतिदिन पूजन और १ हजार मन्त्रजप करने से राज्यलाभ, पदलाभ होता है। ३. कुम्हार के चाक की मिट्टी से मूर्ति बनाकर उपयुक्त विधि से पूजन और जप करने पर इष्ट लाभ। ४. बांबी की मिट्टी से मूर्ति बनाकर पूजा-जपादि से कार्य-सिद्धि। ५. गुड़ की मूर्ति से सौभाग्य-प्राप्ति। ६. नमक की मूर्ति से शत्रुक्षोभ। ७. नीम की मूर्ति से शत्रुनाश।
रुद्रयामल में इसका विशेष प्रयोग इस प्रकार लिखा है— कृष्णा चतुर्थी समारभ्य यावच्छुक्ला चतुर्थिका। सहस्रं प्रजपेन्नित्यं यो वै नियमपूर्वकम् ॥ स्नपयेन्मधुना नित्यं नैवेद्यं गुड-पायसम्। भुक्त्वोच्छिष्टो जपेन्नित्यं गणेशोऽयं सदाप्रियः ॥
प्रयोग — कब और कहाँ
- शुद्ध दक्षिणाचार मूलक उच्छिष्ट महागणपति-प्रयोग
- वाम आचार मूलक उच्छिष्ट महागणपति-प्रयोग
- नवाक्षरी नवार्ण मंत्र जप
- पुरश्चरण
- मूर्ति-पूजन प्रयोग
लाभ
- मनोऽभिलषित सिद्धि
- मनोरथ सिद्धि
- राज्यलाभ
- पदलाभ
- इष्ट लाभ
- कार्य-सिद्धि
- सौभाग्य-प्राप्ति
- शत्रुक्षोभ
- शत्रुनाश
- सर्वविध लाभ