का सरल उत्तर
मनुष्य जन्म से ही पूर्वजों के कर्ज (पितृ ऋण) में बंधा होता है। इससे मुक्ति केवल श्राद्ध और तर्पण करके ही मिल सकती है।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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