विस्तृत उत्तर
धर्मशास्त्रों के अनुसार, मनुष्य जन्म के साथ ही तीन मुख्य ऋणों— देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण— से आबद्ध (बंधा हुआ) होता है। पितृ-ऋण से मुक्ति का एकमात्र साधन श्राद्ध और तर्पण है। गरुड़ पुराण और मत्स्य पुराण स्पष्ट करते हैं कि मंत्रों और श्रद्धा द्वारा अर्पित किया गया अन्न-जल पितरों तक अवश्य पहुँचता है, चाहे वे किसी भी योनि (देव, गंधर्व, मनुष्य, पशु या वृक्ष) में क्यों न हों, ठीक वैसे ही जैसे बछड़ा अपनी माँ को झुंड में भी पहचान लेता है।





