का सरल उत्तर
नहीं, सत्यलोक में बुढ़ापा नहीं होता। भागवत (2.2.27) कहता है — न शोक, न जरा, न मृत्यु। इसीलिए इसे मृत्युंजय लोक कहते हैं।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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