का सरल उत्तर
शतपथ ब्राह्मण: 'यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।' तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.2.1.4): 'यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म।' कारण: यज्ञ के संकल्प से मनुष्य असत्य त्यागकर सत्य की भूमिका में प्रतिष्ठित होता है और उतने काल तक देवत्व की कोटि प्राप्त करता है।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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