विस्तृत उत्तर
शतपथ ब्राह्मण, जो कि शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यंत प्रामाणिक एवं विस्तृत व्याख्या ग्रंथ है, यज्ञ की महत्ता को स्पष्ट करते हुए उद्घोष करता है— 'यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म' अर्थात् यज्ञ संसार के श्रेष्ठतम कार्यों में से एक है। इसी तथ्य की पुष्टि तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.2.1.4) भी 'यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म' कहकर करता है।
जब मनुष्य यज्ञ का संकल्प लेता है, तो उसे यह भावना आत्मसात् करनी पड़ती है कि वह असत्य का परित्याग कर सत्य की भूमिका में प्रतिष्ठित रहे। सत्य की इस भूमिका में प्रतिष्ठित होकर यज्ञानुष्ठान करने से मानव उतने काल तक देवत्व की कोटि को प्राप्त कर लेता है।





