ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 19

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।

English Meaning

He who takes the Self to be the slayer and he who thinks It is slain, neither of them ï1knowsï1. It slays not, nor is It slain.

He who takes the Self to be the slayer and he who thinks It is slain, neither of them ï1knowsï1. It slays not, nor is It slain.

आगे पढ़ें — सांख्य योग के सभी श्लोक · श्रीमद्भगवद्गीता